गुप्त साम्राज्य 5
## 21. गुप्त साम्राज्य
* गुप्त साम्राज्य का उदय तीसरी शताब्दी के अन्त में प्रयाग के निकट कौशाम्बी में हुआ। सम्भवतः गुप्त लोग कुषाणों के सामंत थे।
* गुप्त वंश का संस्थापक श्रीगुप्त (240-280 ई.) था।
* श्रीगुप्त का उत्तराधिकारी घटोत्कच (280-320 ई.) हुआ।
* गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट् चन्द्रगुप्त प्रथम था। यह 320 ई. में गद्दी पर बैठा। इसने लिच्छवि राजकुमारी कुमार देवी से विवाह किया। इसने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की।
* गुप्त संवत् (319-320 ई.) की शुरुआत चन्द्रगुप्त प्रथम ने की।
* चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त हुआ, जो 335 ई. में राजगद्दी पर बैठा। इसने आर्यावर्त के 9 शासकों और दक्षिणावर्त के 12 शासकों को पराजित किया। इन्हीं विजयों के कारण इसे भारत का नेपोलियन कहा जाता है। इसने अश्वमेधकर्ता, विक्रमांक एवं परमभागवत की उपाधि धारण की। इसे कविराज भी कहा जाता है।
* समुद्रगुप्त विष्णु का उपासक था।
* समुद्रगुप्त संगीत-प्रेमी था। ऐसा अनुमान उसके सिक्कों पर उसे वीणा-वादन करते हुए दिखाए जाने से लगाया गया है।
* समुद्रगुप्त का दरबारी कवि हरिषेण था, जिसने इलाहाबाद प्रशस्ति लेख की रचना की।
> **नोट:** परमभागवत की उपाधि धारण करने वाला प्रथम गुप्त शासक समुद्रगुप्त था। गया एवं नालंदा से मिले दो ताम्रलेख में समुद्रगुप्त को परमभागवत कहा गया है।
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* समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी चन्द्रगुप्त-II हुआ, जो 380 ई. में राजगद्दी पर बैठा। इसके समय में चीनी बौद्ध यात्री फाहियान भारत आया।
* शकों पर विजय के उपलक्ष्य में चन्द्रगुप्त-II ने चाँदी के सिक्के चलाए।
* चन्द्रगुप्त-II ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। यह उपाधि इससे पूर्व 57 ई.पू. में उज्जैन के शासक ने भी पश्चिमी भारत में शक क्षत्रपों पर विजय पाने के उपलक्ष्य में धारण की थी।
* शाव चन्द्रगुप्त II का राजकवि था। चन्द्रगुप्त II के समय में पाटलिपुत्र एवं उज्जैनि विद्या के प्रमुख केन्द्र थे।
* अनुश्रुति के अनुसार चन्द्रगुप्त II के दरबार में नौ विद्वानों की एक मंडली निवास करती थी जिसे नवरत्न कहा गया है। महाकवि कालिदास संभवतः इनमें अग्रगण्य थे। कालिदास के अतिरिक्त इनमें धन्वंतरि, क्षपणक (फलित-ज्योतिष के विद्वान), अमरसिंह (कोशकार), शंकु (वास्तुकार), वेतालभट्ट, घटकर्पर, वाराहमिहिर (खगोल विज्ञानी) एवं वररुचि जैसे विद्वान थे।
* चन्द्रगुप्त-II का सान्धिविग्रहिक सचिव वीरसेन शैव मतावलंबी था जिसने शिव की पूजा के लिए उदयगिरि पहाड़ी पर एक गुफा का निर्माण करवाया था। वीरसेन व्याकरण, न्यायमीमांसा एवं शब्द का प्रकाण्ड पंडित तथा एक कवि भी था।
* चन्द्रगुप्त-II का उत्तराधिकारी कुमारगुप्त-I या गोविन्दगुप्त (415 ई.-454 ई.) हुआ।
* नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम ने की थी।
> **नोट:** नालंदा का मठीय विश्वविद्यालय एक महाविहार है क्योंकि यह विभिन्न आकारों के अनेक मठों का संकुल है। नालंदा के बारे में अधिकांश जानकारी चीनी यात्री ह्वेनसांग के अभिलेखों पर आधारित है। इनमें कहा गया है कि एक मठ की नींव कुमारगुप्त I द्वारा पाँचवीं शताब्दी में डाली गई थी और यह निर्माण कार्य परवर्ती सम्राटों के शासन काल में भी चलता रहा, जिन्होंने इस विलक्षण विश्वविद्यालय का कार्य सम्पन्न किया। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि बौद्ध धर्म के सभी तीन सम्प्रदायों-थेरवाद, महायान और वज्रयान के सिद्धांत यहाँ पढ़ाए जाते थे। चीन, तिब्बत, श्रीलंका, थाईलैंड, बर्मा और अनेक अन्य देशों के बौद्ध भिक्षु बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिए नालंदा एवं इसके आस-पास स्थित बोधगया तथा कुर्किहार आदि कें
द्रों में आते थे।
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* कुमारगुप्त-I का उत्तराधिकारी स्कन्दगुप्त (455-467 ई.) हुआ।
* स्कन्दगुप्त ने गिरनार पर्वत पर स्थित सुदर्शन झील का पुनरुद्धार किया।
* स्कन्दगुप्त ने पर्णदत्त को सौराष्ट्र का गवर्नर नियुक्त किया।
* स्कन्दगुप्त के शासनकाल में ही हूणों का आक्रमण शुरू हो गया।
* अंतिम गुप्त शासक विष्णुगुप्त था।
* गुप्त साम्राज्य की सबसे बड़ी प्रादेशिक इकाई 'देश' थी, जिसके शासक को गोप्ना कहा जाता था। एक दूसरी प्रादेशिक इकाई भुक्ति या प्रांत थी, जिसके शासक उपरिक कहलाते थे।
* भुक्ति के नीचे विषय या जिला नामक प्रशासनिक इकाई होती थी, जिसके प्रमुख विषयपति कहलाते थे।
* पुलिस विभाग के साधारण कर्मचारियों को चाट एवं भाट कहा जाता था। पुलिस विभाग का मुख्य अधिकारी दण्डपाशिक कहलाता था।
* प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी। ग्राम का प्रशासन ग्राम-सभा द्वारा संचालित होता था। ग्राम-सभा का मुखिया ग्रामीक कहलाता था एवं अन्य सदस्य महत्तर कहलाते थे।
* ग्राम-समूहों की छोटी इकाई को पेट कहा जाता था।
* गुप्त शासक कुमारगुप्त के दामोदरपुर ताम्रपत्र में भूमि बिक्री संबंधी अधिकारियों के क्रियाकलापों का उल्लेख है।
* भू-राजस्व कुल उत्पादन का 1/4 भाग से 1/6 भाग हुआ करता था।
* गुप्त काल में बलात् श्रम (विष्टि) राज्य के लिए आय का एक स्रोत माना जाता था। इसे जनता द्वारा दिया जाने वाला कर भी माना जाता था।
* आर्थिक उपयोगिता के आधार पर निम्न प्रकार की भूमि थी—
1. क्षेत्र: कृषि करने योग्य भूमि।
2. वास्तु: वास करने योग्य भूमि।
3. चरागाह भूमि: पशुओं के चारा योग्य भूमि।
4. सिल: ऐसी भूमि जो जोतने योग्य नहीं होती थी।
5. अप्रहत: ऐसी भूमि जो जंगली होती थी।
* सिंचाई के लिए रहट या घंटी यंत्र का प्रयोग होता था।
* श्रेणी के प्रधान को ज्येष्ठक कहा जाता था।
* गुप्तकाल में उज्जैन सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र था।
* गुप्त राजाओं ने सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं। इनकी स्वर्ण मुद्राओं को अभिलेखों में दीनार कहा गया है। गुजरात के बाद गुप्त राजाओं ने बड़ी संख्या में चाँदी के सिक्के जारी किए जो केवल स्थानीय लेन-देन में चलते थे।
| गुप्तकालीन प्रसिद्ध मंदिर | स्थान |
| विष्णु मंदिर | तिगवा (जबलपुर, मध्य प्रदेश) |
| शिव मंदिर | भूमरा (नागौदा, मध्य प्रदेश) |
| पार्वती मंदिर | नयना कुठार, (मध्य प्रदेश) |
| दशावतार मंदिर (ईंटों द्वारा निर्मित) | देवगढ़ (ललितपुर, उत्तर प्रदेश) |
| शिव मंदिर | खोह (नागौद, मध्य प्रदेश) |
| लक्ष्मण मंदिर (ईंटों द्वारा निर्मित) | भीतर गाँव कानपुर (उत्तर प्रदेश) |
* कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन याज्ञवल्क्य स्मृति में मिलता है। जाति के रूप में कायस्थों का सर्वप्रथम वर्णन ओशनम् स्मृति में मिलता है।
* विंध्य जंगल में शबर जाति के लोग अपने देवताओं को मनुष्य का मांस चढ़ाते थे।
* पहली बार किसी के सती होने का प्रमाण 510 ई. के भानुगुप्त के एरण अभिलेख से मिलता है, जिसमें किसी भोजराज की मृत्यु पर उसकी पत्नी के सती होने का उल्लेख है।
* गुप्तकाल में वेश्यावृत्ति करने वाली महिलाओं को गणिका कहा जाता था। वृद्ध वेश्याओं को कुट्टनी कहा जाता था।
* गुप्त सम्राट् वैष्णव धर्म के अनुयायी थे तथा उन्होंने इसे राजधर्म बनाया था। विष्णु का वाहन गरुड़ गुप्तों का राजचिह्न था। गुप्तकाल में वैष्णव धर्म संबंधी सबसे महत्वपूर्ण अवशेष देवगढ़ (जिला-ललितपुर) का दशावतार मंदिर है। यह बेतवा नदी के तट पर स्थित है।
* अजन्ता में निर्मित कुल 29 गुफाओं में वर्तमान में केवल 6 ही शेष हैं, जिनमें गुफा संख्या 16 एवं 17 ही गुप्तकालीन हैं। इसमें गुफा संख्या 16 में उत्कीर्ण मरणासन्न राजकुमारी का चित्र प्रशंसनीय है।
* गुफा संख्या 17 के चित्र को चित्रशाला कहा गया है। इस चित्रशाला में बुद्ध के जन्म, जीवन, महाभिनिष्क्रमण एवं महापरिनिर्वाण की घटनाओं से संबंधित चित्र उद्धृत किये गये हैं।
* अजंता की गुफाएँ बौद्धधर्म की महायान शाखा से संबंधित हैं।
* गुप्तकाल में निर्मित अन्य गुफा बाघ की गुफा है, जो धार (जिला-धार, म. प्र.) नामक स्थान पर विंध्यपर्वत को काटकर बनायी गयी थी।
* गुप्तकाल में विष्णु शर्मा द्वारा लिखित पंचतंत्र (संस्कृत) को संसार का सर्वाधिक प्रचलित ग्रंथ माना जाता है। बाइबिल के बाद इसका स्थान दूसरा है। इसे पाँच भागों में बाँटा गया है—1. मित्रभेद, 2. मित्रलाभ, 3. संधि-विग्रह, 4. लब्ध-प्रणाश, 5. अपरीक्षाकारित्व।
* आर्यभट्ट ने आर्यभट्टीयम एवं सूर्यसिद्धान्त नामक ग्रंथ लिखे। उसने सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण के वास्तविक कारण बताए। आर्यभट्ट पहला भारतीय नक्षत्र वैज्ञानिक थे जिसने घोषणा की कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है।
* वराहमिहिर ने बृहत् संहिता, पंचसिद्धांत बृहज्जातक और लघुजातक की रचना की। बृहत् संहिता में नक्षत्र विद्या, वनस्पतिशास्त्र, प्राकृतिक इतिहास और भौतिक भूगोल के विषयों पर चर्चा की गई है।
* ब्रह्मगुप्त इस युग के महान नक्षत्र वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ थे। उसने यह घोषणा करके न्यूटन के सिद्धांत की पूर्व कल्पना कर ली: "प्रकृति के एक नियम के अनुसार सभी वस्तुएँ पृथ्वी पर गिरती हैं, क्योंकि पृथ्वी स्वभाव से ही सभी वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।"
> **नोट:** संग्राहाणि सूत्र एक ब्रह्मांड संबंधी ग्रंथ है, जिसकी रचना बारहवीं शताब्दी में की गई थी, जिसमें ब्रह्मांड की संरचना और अंतरिक्ष के बारे में अवधारणाएं शामिल हैं।
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* गुप्तकाल में पलकाप्प्य ने पशु-चिकित्सा पर हस्तायुर्वेद लिखा।
* नवनीतकम की रचना गुप्तकाल में की गई है। इस पुस्तक में नुस्खे, सूत्र और उपचार-विधियाँ दी गई हैं।
* पुराणों की वर्तमान रूप में रचना गुप्तकाल में हुई। इसमें ऐतिहासिक परंपराओं का उल्लेख है।
* संस्कृत गुप्त राजाओं की शासकीय भाषा थी।
* गुप्तकाल में चाँदी के सिक्कों को रूपका कहा जाता था।
* याज्ञवल्क्य, नारद, कात्यायन एवं बृहस्पति स्मृतियों की रचना गुप्तकाल में ही हुई।
* मंदिर बनाने की कला का जन्म गुप्तकाल में ही हुआ। त्रिमूर्ति की अवधारणा का विकास गुप्तकाल में ही हुआ। गुप्तवंश के शासकों ने मंदिरों एवं ब्राह्मणों को सबसे अधिक ग्राम अनुदान में दिया।
* गुप्तकाल लौकिक साहित्य की सर्जना के लिए स्मरणीय है। भास के तेरह नाटक इसी काल के हैं। शूद्रक का लिखा नाटक मृच्छकटिकम् या माटी की खिलौनागाड़ी जिसमें निर्धन ब्राह्मण के साथ वेश्या का प्रेम वर्णित है, प्राचीन नाटकों में सर्वोत्कृष्ट माना जाता है।
* देवीचन्द्रगुप्तम् विशाखदत्त की संस्कृत नाटक है। यह गुप्त राजा रामगुप्त की कहानी है जो अपनी रानी ध्रुवदेवी को एक शक आक्रमणकारी को सौंपने का फैसला करता है लेकिन उसका छोटा भाई चन्द्रगुप्त रानी के भेष में दुश्म
न के शिविर में प्रवेश करता है और दुश्मन को मार डालता है।
इतिहास
* कालिदास की कृति अभिज्ञानशाकुंतलम् (राजा दुष्यंत एवं शकुंतला के प्रेम की कथा) द्वितीय भारतीय रचना है जिसका अनुवाद यूरोपीय भाषाओं में हुआ। ऐसी प्रथम रचना है भगवद्गीता।
* सांस्कृतिक उपलब्धियों के कारण गुप्तकाल को भारतीय इतिहास का स्वर्ण युग कहा जाता है।
> **नोट:** नगरों का क्रमिक पतन गुप्तकाल की महत्वपूर्ण विशेषता थी।
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## 22. वाकाटक राजवंश
* वाकाटक राजवंश की स्थापना 255 ई. के लगभग विन्ध्यशक्ति नामक व्यक्ति ने की थी। इसके पूर्वज सातवाहनों के अधीन वरार (विदर्भ) के स्थानीय शासक थे।
* विन्ध्यशक्ति के पश्चात उसका पुत्र प्रवरसेन प्रथम (275–335 ई.) शासक हुआ। वाकाटक वंश का वह अकेला ऐसा शासक था जिसने सम्राट् की उपाधि धारण की थी। पुराणों से पता चलता है कि उसने चार अश्वमेध यज्ञ किया था।
* प्रवरसेन के पश्चात वाकाटक साम्राज्य दो शाखाओं में विभक्त हो गया—प्रधान शाखा तथा वासीय (वत्सगुल्म) शाखा। दोनों शाखाओं ने समानान्तर रूप से शासन किया।
* प्रधान शाखा के प्रमुख राजा—रूद्रसेन प्रथम (335–360 ई.), प्रभावती गुप्ता का संरक्षण काल (390–410), प्रवरसेन द्वितीय (410–440 ई.) नरेन्द्र सेन (440–460 ई.), पृथ्वीसेन द्वितीय (460–480 ई.)
* गुप्त शासक चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्ता का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन द्वितीय से किया। वाकाटकों का राज्य गुप्त एवं शक राज्यों के बीच था। राज्यों पर विजय प्राप्त करने के लिए चन्द्रगुप्त-II ने इस संबंध को स्थापित किया था। विवाह के कुछ समय बाद रुद्रसेन द्वितीय की मृत्यु हो गई। चूंकि उसके दोनों पुत्र दियाकर सेन एवं दामोदर सेन अवयस्क थे, अतः प्रभावतीगुप्ता ने शासन संभाला। यह काल वाकाटक गुप्त संबंध का स्वर्णकाल रहा।
* प्रभावतीगुप्ता के संरक्षण काल के बाद उसका कनिष्ठ पुत्र दामोदर सेन प्रवरसेन द्वितीय के नाम से गद्दी पर बैठा।
* पृथ्वीसेन-II वाकाटकों की प्रधान शाखा का अंतिम शासक था। उसके बाद उसका राज्य वासीम शाखा के हरिषेण के हाथों में चला गया।
**वासीम शाखा के वाकाटक**
* वाकाटक वंश की इस शाखा की स्थापना 330 ई. में सम्राट् प्रवरसेन के छोटे पुत्र सर्वसेन ने की थी। उसने वत्सगुल्म नामक स्थान पर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। वत्सगुल्म महाराष्ट्र के अकोला जिले में आधुनिक वासीम में स्थित था।
* **वासीम शाखा के प्रमुख राजा:** सर्वसेन, विन्ध्यशक्ति द्वितीय (350–400 ई.), प्रवरसेन द्वितीय (400–415 ई.), हरिषेण (475–510 ई.)
* हरिषेण वासीम शाखा का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। यह वाकाटक वंश का अंतिम ज्ञात शासक है।
* वाकाटक वंश के राजा प्रवरसेन द्वितीय ने मराठी प्राकृतकाव्य सेतुबन्ध की रचना की तथा सर्वसेन ने हरिविजय नामक प्राकृत काव्य-ग्रंथ लिखा। संस्कृत की वैदर्भी शैली का पूर्ण विकास वाकाटक नरेशों के दरबार में हुआ।
* कुछ विद्वानों का मत है कि चन्द्रगुप्त द्वितीय के राजकवि कालिदास ने कुछ समय तक प्रवरसेन द्वितीय की राजसभा में निवास किया था। वहां उन्होंने उसके सेतुबन्ध का संशोधन किया तथा वैदर्भी शैली में अपना काव्य मेघदूत लिखा।
* वाकाटक नरेश ब्राह्मण धर्मावलंबी थे। वे शिव व विष्णु के उपासक थे।
* वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय के सामन्त व्याघ्रदेव ने नचना के मंदिर का निर्माण करवाया।
* अजन्ता का सोलहवां तथा सत्रहवां गुहा विहार और उन्नीसवें गुहा चैत्य का निर्माण वाकाटकों के शासन काल में हुआ।
## 23. पुष्यभूति वंश या वर्द्धन वंश
* गुप्त वंश के पतन के बाद जिन नये राजवंशों का उद्भव हुआ, उनमें मैत्रक, मौखरि, पुष्यभूति, परवर्ती गुप्त और गौड़ प्रमुख हैं। इन राजवंशों में पुष्यभूति वंश के शासकों ने सबसे विशाल साम्राज्य स्थापित किया।
* पुष्यभूति वंश के संस्थापक पुष्यभूति था। इनकी राजधानी थानेश्वर (हरियाणा प्रांत के कुरुक्षेत्र जिले में स्थित वर्तमान थानेसर स्थान) थी।
* प्रभाकरवर्द्धन इस वंश की स्वतंत्रता का जन्मदाता था तथा प्रथम प्रभावशाली शासक था, जिसने परमभट्टारक और महाराजाधिराज जैसी सम्मानजनक उपाधियाँ धारण की।
* प्रभाकरवर्द्धन की पत्नी यशोमती से दो पुत्र—राज्यवर्द्धन और हर्षवर्द्धन तथा एक कन्या राज्यश्री उत्पन्न हुई। राज्यश्री का विवाह कन्नौज के मौखरि राजा ग्रहवर्मा के साथ हुआ।
* मालवा के शासक देवगुप्त ने ग्रहवर्मा की हत्या कर दी और राज्यश्री को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया।
* राज्यवर्द्धन ने देवगुप्त को मार डाला, परंतु देवगुप्त के मित्र गौड़ नरेश शशांक ने धोखा देकर राज्यवर्द्धन की हत्या कर दी।
> **नोट:** शशांक शैव धर्म का अनुयायी था। इसने बोधिवृक्ष (बोधगया) को कटवा दिया।
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* राज्यवर्द्धन की मृत्यु के बाद 606 ई. में 16 वर्ष की अवस्था में हर्षवर्धन थानेश्वर की गद्दी पर बैठा। हर्ष को शिलादित्य के नाम से भी जाना जाता था। इसने परमभट्टारक नरेश की उपाधि धारण की थी।
* हर्ष ने शशांक को पराजित करके कन्नौज पर अधिकार कर लिया तथा उसे अपनी राजधानी बनाया।
* हर्ष और पुलकेशिन-II के बीच नर्मदा नदी के तट पर युद्ध हुआ, जिसमें हर्ष की पराजय हुई।
* चीनी यात्री ह्वेनसाँग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया।
> **नोट:** ह्वेनसाँग को यात्रियों में राजकुमार, नीति का पंडित एवं वर्तमान शाक्यमुनि कहा जाता है। वह नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने एवं बौद्ध ग्रंथ संग्रह करने के उद्देश्य से भारत आया था।
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* हर्ष 641 ई. में अपने दूत चीन भेजे तथा 643 ई. एवं 645 ई. में दो चीनी दूत उसके दरबार में आए।
* हर्ष ने कश्मीर के शासक से बुद्ध के दंत अवशेष बलपूर्वक प्राप्त किए।
* हर्ष के पूर्वज भगवान शिव और सूर्य के अनन्य उपासक थे। प्रारंभ में हर्ष भी अपने कुलदेवता शिव का परम भक्त था। चीनी यात्री ह्वेनसाँग से मिलने के बाद उसने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजाश्रय प्रदान किया तथा वह पूर्ण बौद्ध बन गया।
* हर्ष के समय में नालंदा महाविहार महायान बौद्ध धर्म की शिक्षा का प्रधान केंद्र था।
* हर्ष के समय में प्रयाग में प्रति पाँचवें वर्ष एक समारोह आयोजित किया जाता था जिसे महामोक्षपरिषद कहा जाता था। ह्वेनसाँग स्वयं 6ठे समारोह में सम्मिलित हुआ।
* बाणभट्ट हर्ष के दरबारी कवि थे। उन्होंने हर्षचरित एवं कादम्बरी की रचना की। बाणभट्ट के गुरु भर्तु थे।
* प्रियदर्शिका, रत्नावली तथा नागानन्द नामक तीन संस्कृत नाटक ग्रंथों की रचना हर्ष ने की थी। कहा जाता है कि धावक नामक कवि ने हर्ष से पुरस्कार लेकर उसके नाम से ये तीनों नाटक लिख दिए।
* हर्ष को भारत का अंतिम हिन्दू सम्राट् कहा गया है, लेकिन वह न तो कट्टर हिन्दू था और न ही सारे देश का शासक ही।
* हर्ष के अधीनस्थ शासक महाराज अथवा महासामन्त कहे जाते थे।
* हर्ष के मंत्रीपरिषद के मंत्री को सचिव या अमात्य कहा जाता था।
* प्रशासन की सुविधा के लिए हर्ष का साम्राज्य कई प्रांतों में विभाजित था। प्रांत को भुक्ति कहा जाता था। प्रत्येक भुक्ति का
शासक राष्ट्रीय, उपरिक अथवा राष्ट्रीय कहलाता था।
* **भुक्ति का विभाजन जिलों में हुआ था।** जिले की संज्ञा थी **विषय**, जिसका प्रधान **विषयपति** होता था। विषय के अन्तर्गत कई पाठक (आधुनिक तहसील) होते थे।
* **ग्राम, शासन की सबसे छोटी इकाई थी।** ग्राम शासन का प्रधान **ग्रामाक्षपटलिक** कहा जाता था।
* **पुलिस कर्मियों** को चाट या भाट कहा गया है। दण्डपाशिक तथा दाण्डिक पुलिस विभाग के अधिकारी होते थे।
* **अश्व सेना के अधिकारियों को बृहदेश्वर, पैदल सेना के अधिकारियों को बलाधिकृत या महाबलाधिकृत कहा जाता था।**
* **हर्षचरित में सिंचाई के साधन के रूप में तुलायंत्र (जलपंप) का उल्लेख मिलता है।**
* **हर्ष के समय मधुरा सूती वस्त्रों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध था।**
**नोट :** *हर्षचरित में प्रान्तीय शासक के लिए 'लोकपाल' शब्द आया है।*
**हर्षचरित के अनुसार हर्ष की मंत्रिपरिषद**
* **भण्डि** : प्रधान सचिव
* **सिंहनाद** : प्रधान सेनापति
* **कुन्तल** : अश्व सेना का प्रधान
* **स्कन्दगुप्त** : गज सेना का प्रमुख
### **24. दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश**
#### **पल्लव वंश**
* **पल्लव वंश का संस्थापक सिंहविष्णु (575-600 ई.) था।** इसकी राजधानी **काँची (तमिलनाडु में काँचीपुरम)** थी। वह वैष्णव धर्म का अनुयायी था।
* **सिंहविष्णु ने अवनि सिंह की उपाधि धारण की।**
* **सिंहविष्णु ने मामल्लपुरम में आदि वराह मंदिर का निर्माण करवाया।**
* **किरातार्जुनीयम् के लेखक भारवि सिंहविष्णु के दरबार में रहते थे।**
* **पल्लव वंश के प्रमुख शासक हुए :** क्रमशः महेन्द्र वर्मन प्रथम (600–630 ई.), नरसिंह वर्मन प्रथम (630–668 ई.), महेन्द्र वर्मन द्वितीय (668–670 ई.), परमेश्वर वर्मन प्रथम (670–700 ई.), नरसिंहवर्मन-II (700–728 ई.), नन्दिवर्मन-II (730–800 ई.)।
* **मत्तविलास प्रहसन की रचना महेन्द्रवर्मन ने की थी।**
* **महेन्द्रवर्मन शुरू में जैन-मतावलंबी था, परन्तु बाद में तमिल संत अप्पर के प्रभाव में आकर शैव बन गया था।**
* **महाबलीपुरम् के एकाश्म मंदिर जिन्हें रथ कहा गया है, का निर्माण पल्लव राजा नरसिंह वर्मन प्रथम के द्वारा करवाया गया था।** रथ मंदिरों की संख्या सात है। रथ मंदिरों में सबसे छोटा द्रौपदी रथ है जिसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता है।
* **वातापीकोड व महामल्ल की उपाधि नरसिंहवर्मन-I ने धारण की थी।** इसके शासन काल में चीनी यात्री हुएन-त्सांग काँची आया था।
* **परमेश्वर वर्मन प्रथम शैवमतानुयायी था।** उसने *लोकादित्य, एकमल्ल, रणजय, अत्यंतकाम, उग्रदण्ड, गुणभाजन* आदि की उपाधियाँ ग्रहण की थी। उसने मामल्लपुरम में गणेश मंदिर का निर्माण करवाया था।
* **परमेश्वर वर्मन प्रथम विद्याप्रेमी भी था और उसने विद्याविनीत की उपाधि भी ली थी।**
* **अरबों के आक्रमण के समय पल्लवों का शासक नरसिंहवर्मन-II था।** उसने 'राजासिंह' (राजाओं में सिंह), 'आगमप्रिय' (शास्त्रों का प्रेमी) और शंकरभक्त (शिव का उपासक) की उपाधियाँ धारण कीं। उसने काँची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण करवाया जिसे **राजसिद्धेश्वर मंदिर** भी कहा जाता है। इसी मंदिर के निर्माण से द्रविड़ स्थापत्य कला की शुरुआत हुई। (महाबलिपुरम् में शोर मंदिर का निर्माण भी नरसिंहवर्मन-II ने किया)।
* **काँची के कैलाशनाथ मंदिर में पल्लव राजाओं और रानियों की आदमकद तस्वीरें लगी हैं।**
**नोट :** *ऐलोरा की गुफा संख्या 16 के कैलाशनाथ मंदिर के बायीं दीवार पर आठवीं शताब्दी में बनाई गई आकृति में रावण को कैलाश पर्वत हिलाते हुए दिखाया गया है जिस पर शिव एवं पार्वती लोगों के साथ विराजमान हैं।*
* **दशकुमारचरित के लेखक दण्डी नरसिंहवर्मन-II के दरबार में रहते थे।**
* **काँची के मुक्तेश्वर मंदिर तथा वैकुण्ठ पेरुमाल मंदिर का निर्माण नन्दिवर्मन-II ने कराया।** प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमंगई अलवार नन्दिवर्मन-II के समकालीन थे।
* **नंदिवर्मन III शैव मतानुयायी था,** उसकी राज सभा में तमिल भाषा का प्रसिद्ध कवि संत पेरुन्देवनार निवास करता था, जिसने भारतवेणवा नामक ग्रंथ की रचना की।
* **पल्लव वंश का अंतिम शासक कम्प वर्मा (948-980) था।**
**नोट :** *पल्लवकाल में कवि भारवि की लोकप्रिय रचना किरातार्जुनीयम थी।*
#### **चोल**
* **9वीं शताब्दी में चोल वंश पल्लवों के ध्वंसावशेषों पर स्थापित हुआ।** इस वंश के संस्थापक **विजयालय (850-87 ई.)** थे जिसकी राजधानी **तांजाय (तंजौर या तंजावूर)** था। तंजाबूर का वास्तुकार कुंजरमल्लन राजराज पेरुत्थचन था।
* **विजयालय ने नरकेसरी की उपाधि धारण की और निशुम्भसूदिनी देवी का मंदिर बनवाया।** चोलों का स्वतंत्र राज्य आदित्य प्रथम ने स्थापित किया। पल्लवों पर विजय पाने के उपरान्त आदित्य प्रथम ने कोदण्डराम की उपाधि धारण की।
* **तक्कोलम् के युद्ध में राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण-III ने परांतक-I को पराजित किया।** इस युद्ध में परांतक-I का बड़ा लड़का राजादित्य मारा गया।
* **राजराज प्रथम ने श्रीलंका पर आक्रमण किया।** वहाँ के राजा महिम-V को भागकर श्रीलंका के दक्षिण जिला रोहण में शरण लेनी पड़ी।
* **राजराज-I श्रीलंका के विजित प्रदेशों को चोल साम्राज्य का एक नया प्रांत मुण्डिचोलमंडलम (राजधानी—पोलन्नरुवा) बनाया।**
* **राजराज-I शैव धर्म का अनुयायी था।** इसने तंजौर में राजराजेश्वर का शिवमंदिर बनाया।
* **चोल साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार राजेन्द्र प्रथम के शासनकाल में हुआ है।** बंगाल के पाल शासक महिपाल को पराजित करने के बाद राजेन्द्र प्रथम ने गंगैकोडचोल की उपाधि धारण की और नवीन राजधानी गंगैकोड चोलपुरम् के निकट चोलगंगम नामक विशाल तालाब का निर्माण करवाया।
##### **चोल काल में भूमि के प्रकार**
* **वेल्लनवगाई :** गैर ब्राह्मण किसान स्वामी की भूमि।
* **ब्रह्मदेय :** ब्राह्मणों को उपहार में दी गई भूमि।
* **शालाभोग :** किसी विद्यालय के रख-रखाव की भूमि।
* **देवदान या तिरुनमटुक्कनी :** मंदिर को उपहार में दी गई भूमि।
* **पल्लिच्छंदम :** जैन संस्थानों को दान दी गई भूमि।
**नोट :** *गजनी का सुल्तान महमूद राजेन्द्र प्रथम का समकालीन था।*
* **राजेन्द्र-II ने प्रकेसरी की एवं वीर राजेन्द्र ने राजकेसरी की उपाधि धारण की।** चोल वंश का अंतिम राजा राजेन्द्र-III था।
* **चोलों एवं पश्चिमी चालुक्य के बीच शांति स्थापित करने में गोवा के कदम्व शासक जयकेश प्रथम ने मध्यस्थ की भूमिका निभायी थी।**
* **विक्रम चोल अभाव एवं अकाल से ग्रस्त गरीब जनता से राजस्व वसूल कर चिदंबरम् मंदिर का विस्तार करा रहा था।**
* **कलोतुंग-II ने चिदंबरम् मंदिर में स्थित गोविन्दराज (विष्णु) की मूर्ति को समुद्र में फेंकवा दिया।** कालान्तर में वैष्णव आचार्य रामानुजाचार्य ने उक्त मूर्ति का पुनरुद्धार किया और उसे तिरुपति के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित किया।
* **चोल प्रशासन में भाग लेने वाले उच्च पदाधिकारियों को पेरुनदरम् एवं निम्न श्रेणी के पदाधिकारियों को शेरुन्दरन कहा जाता था।** लेखों में कुछ उच्चाधिकारियों को उडनकूटम् कहा ग
या है जिसका अर्थ है—सदा राजा के पास रहने वाला अधिकारी।
* **सम्पूर्ण चोल साम्राज्य 6 मंडलों (प्रांत) में विभक्त था।** मंडलम् **कोट्टम्** में, कोट्टम् **नाडु** में एवं नाडु कई **कुर्रम्** में विभक्त था।
* **नाडु की स्थानीय सभा को नाटूर एवं नगर की स्थानीय सभा को नगरतार कहा जाता था।**
* **वेल्लाल जाति के धनी किसानों को केन्द्रीय सरकार की देख-रेख में नाडु के काम-काज में अच्छा-खासा नियंत्रण हासिल था।** उनमें से कई धनी भू-स्वामियों को चोल राजाओं के सम्मान के रूप में **मुवेंदवेलन** (तीन राजाओं को अपनी सेवाएँ प्रदान करने वाला वेलन या किसान) **अरइयार** (प्रधान) जैसी उपाधियाँ दीं उन्हें केन्द्र में महत्त्वपूर्ण राजकीय पद सौंपे।
* **स्थानीय स्वशासन चोल प्रशासन की मुख्य विशेषता थी।**
* **उर सर्वसाधारण लोगों की समिति थी,** जिसका कार्य होता था सार्वजनिक कल्याण के लिए तालाबों और बगीचों के निर्माण हेतु गाँव की भूमि का अधिग्रहण करना।
* **सभा या महासभा :** यह मूलतः अग्रहारों और ब्राह्मण बस्तियों की सभा थी, जिसके सदस्यों को **पेरुमक्कल** कहा जाता था। यह सभा **वरियम** नाम की समितियों के द्वारा अपने कार्य को संचालित करती थी। सभा की बैठक गाँव में मंदिर के निकट वृक्ष के नीचे या तालाब के किनारे होती थी। व्यापारियों की सभा को **नगरम्** कहते थे।
* **चोल काल में भूमिकर उपज का 1/3 भाग हुआ करता था।**
* **गाँव में कार्यसमिति की सदस्यता के लिए जो वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते थे, उन्हें मध्यस्थ कहते थे।**
**उत्तरमेरुर अभिलेख के अनुसार सभा की सदस्यता**
1. सभा की सदस्यता के लिए इच्छुक लोगों को ऐसी भूमि का स्वामी होना चाहिए, जहाँ से भू-राजस्व वसूला जाता है।
2. उनके पास अपना घर होना चाहिए।
3. उनकी उम्र 35 से 70 के बीच होनी चाहिए।
4. उन्हें वेदों का ज्ञान होना चाहिए।
5. उन्हें प्रशासनिक मामलों की अच्छी जानकारी होनी चाहिए और ईमानदार होना चाहिए।
6. यदि कोई पिछले तीन सालों में किसी समिति का सदस्य रहा है तो वह किसी और समिति का सदस्य नहीं बन सकता।
7. जिसने अपने या अपने संबंधियों के खाते जमा नहीं कराए हैं, वह चुनाव नहीं लड़ सकता।
* **ब्राह्मणों को दी गई करमुक्त भूमि को चतुर्वेदि मंगलम् एवं दान दी गयी भूमि ब्रह्मदेय कहलाती थी।**
* **चोल सेना का सबसे संगठित अंग था–पदाति सेना।**
* **चोल काल में कलंजु सोने के सिक्के थे।**
* **तमिल कवियों में जयंगोंदर प्रसिद्ध कवि था, जो कुलोतुंग प्रथम का राजकवि था।** उसकी रचना है—**कलिंगत्तुपर्णि**।
* **कंबन, ओट्टक्कुट्टन और पुगलेंदि को तमिल साहित्य का और पंप, पोन्न एवं रन्न कन्नड़ साहित्य का त्रिरत्न कहा जाता है।**
* **पर्सी ब्राउन ने तंजौर के बृहदेश्वर मंदिर के विमान को भारतीय वास्तुकला का निकष माना है।** चोलकालीन नटराज प्रतिमा को चोल कला का सांस्कृतिक सार या निचोड़ कहा जाता है। नटराज प्रतिमा में शिव को उनकी दाहिनी टांग पर संतुलित रूप से खड़े हुए और उसी टांग के पंजे से अज्ञान या विस्मृति के दैत्य अपस्मार को दबाते हुए दिखाया गया है। साथ ही शिव भुजंगत्रा-सित की स्थिति में अपनी बायीं टांग उठाए हुए हैं जो तिरोभाव यानी भक्त के मन से माया या भ्रम का परदा हटा देने का द्योतक है। उनकी चारों भुजाएँ बाहर की ओर फैली हुई हैं और मुख्य दाहिना हाथ अभय हस्त की मुद्रा में उठा हुआ है। उनका ऊपरी दायाँ हाथ डमरू, जो उनका प्रिय वाद्य है, पकड़े हुए तालबद्ध ध्वनि उत्पन्न करता हुआ दिखाया गया है। ऊपरी बायाँ दोलहस्त मुद्रा में दाहिने हाथ की अभयहस्त मुद्रा से जुड़ा हुआ है। उनकी जटाएँ दोनों ओर छिटकी हुई हैं और उस वृत्ताकार ज्वाला को छू रही है जो नृत्यरत संपूर्ण आकृति को घेरे हुए है। शिव को भारत में नृत्य कला का अधिष्ठाता देवता भी माना जाता है।
* **चोल कांस्य प्रतिमाएँ संसार की सबसे उत्कृष्ट कांस्य प्रतिमाओं में गिनी जाती हैं।** कांस्य प्रतिमाएँ बनाने की कला के संरक्षक के रूप में चोल वंशीय विधवा महारानी संवियान महादेवी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
* **शैव संत ईशानशिव पंडित राजेन्द्र-I के गुरु थे।**
* **चोल काल (10वीं सदी) का सबसे महत्वपूर्ण बन्दरगाह कावेरीपट्टनम था।**
* **बहुत बड़ा गाँव, जो एक इकाई के रूप में शासित किया जाता था, तनियर कहलाता था।**
* **उत्तरमेरूर शिलालेख, जो सभा-संस्था का विस्तृत वर्णन उपस्थित करता है, परांतक प्रथम के शासनकाल से संबंधित है।**
* **चोलों की राजधानी कालक्रम के अनुसार थी—उरैयूर, तंजौड़, गंगैकोंड, चोलपुरम् एवं काँची।**
* **चोल काल में सड़कों की देखभाल बगान समिति करती थी।**
* **चोल काल में आम वस्तुओं के आदान-प्रदान का आधार धान था।**
* **चोल काल के विशाल व्यापारी-समूह निम्न थे—वलंजियार, नानादेशी एवं मनिग्रामम्।**
* **विष्णु के उपासक अलवार व शिव के उपासक नयनार संत कहलाते थे।**
#### **चालुक्य वंश (कल्याणी)**
* **कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना तैलप-II ने की थी।** (राजधानी—मान्यखेट)।
* चालुक्य वंश (कल्याणी) के प्रमुख शासक हुए—तैलप प्रथम, तैलप द्वितीय, विक्रमादित्य, जयसिंह, सोमेश्वर, सोमेश्वर-II, विक्रमादित्य-VI, सोमेश्वर-III एवं तैलप-III।
* **सोमेश्वर प्रथम ने मान्यखेट से राजधानी हटाकर कल्याणी (कर्नाटक) को बनाया।** इस वंश का सबसे प्रतापी शासक **विक्रमादित्य-VI** था।
* **विल्हण एवं विज्ञानेश्वर विक्रमादित्य-VI के दरबार में ही रहते थे।**
* **मितार्क्षरा (हिन्दू विधि ग्रंथ, याज्ञवल्क्य स्मृति पर व्याख्या)** नामक ग्रंथ की रचना महान विधिवेत्ता **विज्ञानेश्वर** ने की थी।
* **विक्रमांकदेवचरित** की रचना **विल्हण** ने की थी। इसमें विक्रमादित्य-VI के जीवन पर प्रकाश डाला गया है।
#### **चालुक्य वंश (वातापी/बादामी)**
* **जयसिंह ने वातापी के चालुक्य वंश की स्थापना की,** जिसकी राजधानी **वातापी (बीजापुर के निकट)** थी। इस वंश के प्रमुख शासक थे—पुुलकेशिन प्रथम, कीर्तिवर्मन-I, मंगलेश, पुलकेशिन-II, विक्रमादित्य, विनयादित्य एवं विजयादित्य। इनमें सबसे प्रतापी राजा **पुलकेशिन-II** था।
* **वातापी के चालुक्यों को सामन्त स्थिति से स्वतंत्र स्थिति में लाने वाला पहला शासक पुलकेशिन प्रथम था, इसलिए इसे भी चालुक्य राजवंश (वातापी) का संस्थापक कहा जाता है।** 543-44 में उसने वातापी के निकटवर्ती पहाड़ी की किलेबंदी करके दुर्ग का रूप दिया तथा अश्वमेध यज्ञ करके अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।
* **वातापी का निर्माणकर्ता कीर्तिवर्मन-I को माना जाता है।**
* **कीर्तिवर्मन प्रथम के द्वारा कोंकण विजय के फलस्वरूप गोवा का प्रमुख बंदरगाह चालुक्य साम्राज्य के अधीन आ गया।**
**नोट :** *गोवा उन दिनों रेवती द्वीप के नाम से प्रसिद्ध था।*
* **महाकूट स्तम्भ लेख से प्रमाणित होता है कि पुलकेशिन-II बहु सुवर्ण एवं अग्निष्टोम यज्ञ सम्पन्न करवाया था।** जिनेन्द्र का मेगुती मंदिर पुलकेशिन-II ने बनवाया था।
* **पुलकेशिन-II ने हर्षवर्धन को हराकर परमेश्वर की उपाधि धारण की थी।** इ
सने **'दक्षिणापथेश्वर'** की उपाधि भी धारण की थी।
* **पुलकेशिन-II ने ईरान के शाह खुशरों-II के दरबार में राजदूत भेजा।** बाद में संभवतः शाह खुश्रू-II ने भी अपना दूत चालुक्य सम्राट के दरबार में भेजा।
* **लगभग 641 ई. में चीनी यात्री हुएनसांग पुलकेशिन-II के राज्य में गया था।**
* **पल्लववंशी शासक नरसिंह वर्मन प्रथम ने पुलकेशिन-II को लगभग 642 ई. में परास्त किया और उसकी राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया।** संभवतः इसी युद्ध में पुलकेशिन-II मारा गया। इसी विजय के बाद नरसिंहवर्मन ने **'वातापिकोड'** की उपाधि धारण की।
* **ऐहोल अभिलेख का संबंध पुलकेशिन-II से है।** (लेखक—रविकीर्ति)
* **अजन्ता के एक गुहाचित्र में फारसी दूत-मंडल को स्वागत करते हुए पुलकेशिन-II को दिखाया गया है।**
* **मालवा को जीतने के बाद विनयादित्य ने सकलोत्तरपथनाथ की उपाधि धारण की।**
* **विक्रमादित्य-II के शासनकाल में ही दक्कन में अरबों ने आक्रमण किया।** इस आक्रमण का मुकाबला विक्रमादित्य के भतीजा पुलकेशी ने किया। इस अभियान की सफलता पर विक्रमादित्य-II ने इसे **अवनिजनाश्रय** की उपाधि प्रदान की।
* **विक्रमादित्य-II की प्रथम पत्नी लोकमहादेवी ने पट्टदकल में विरूपाक्षमहादेव मंदिर तथा उसकी दूसरी पत्नी त्रैलोक्य देवी ने त्रैलोकेश्वर मंदिर का निर्माण करवायी।**
* **इस वंश का अंतिम राजा कीर्तिवर्मन द्वितीय था।** इसे इसके सामंत दन्तिदुर्ग ने परास्त कर एक नये वंश (राष्ट्रकूट वंश) की स्थापना की।
* **ऐहोल को मंदिरों का शहर कहा जाता है।**
#### **चालुक्य वंश (वेंगी)**
* **वेंगी के चालुक्य वंश का संस्थापक विष्णुवर्धन था।** इसकी राजधानी **वेंगी (आन्ध्र प्रदेश में)** थी। इस वंश के सबसे प्रतापी राजा विजयादित्य तृतीय था, जिसका सेनापति पंडरंग था।
#### **राष्ट्रकूट**
* **राष्ट्रकूट राजवंश का संस्थापक दन्तिदुर्ग (752 ई.) था।** शुरुआत में वे कर्नाटक के चालुक्य राजाओं के अधीन थे। इसकी राजधानी **मानखिर या मान्यखेत (वर्तमान मालखेड़, शोलापुर के निकट)** थी।
* **राष्ट्रकूट वंश के प्रमुख शासक थे :** कृष्ण प्रथम, ध्रुव, गोविन्द तृतीय, अमोघवर्ष, कृष्ण-II, इन्द्र-III एवं कृष्ण-III।
* **एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्ण प्रथम ने करवाया था।**
* **ध्रुव राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक था, जिसने कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया और प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया।**
* **ध्रुव को 'धारावर्ष' भी कहा जाता था।**
* **गोविन्द-III ने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर चक्रायुद्ध व उसके संरक्षक धर्मपाल तथा प्रतिहार वंश के शासक नागभट्ट-II को पराजित किया।**
* **पल्लव, पाण्ड्य, केरल व गंग शासकों के संघ को गोविन्द-III ने नष्ट किया।**
* **अमोघवर्ष जैनधर्म का अनुयायी था।** इसने कन्नड़ में **कविराजमार्ग** की रचना की। *आदिपुराण* के रचनाकार **जिनसेन**, *गणितासार संग्रह* के लेखक **महावीराचार्य** एवं *अमोघवृत्ति* के लेखक **सकटायना** अमोघवर्ष के दरबार में रहते थे। अमोघवर्ष ने तुंगभद्रा नदी में जल-समाधि लेकर अपने जीवन का अंत किया।
* **इन्द्र-III के शासन काल में अरब निवासी अलमसूदी भारत आया;** उसने तत्कालीन राष्ट्रकूट शासकों को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा।
* **राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान शासक कृष्ण-III था।** इसी के दरबार में कन्नड़ भाषा के कवि पोन्न रहते थे जिन्होंने शान्तिपुराण की रचना की।
* **कल्याणी के चालुक्य तैलप-II ने 973 ई. में कर्क को हराकर राष्ट्रकूट राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और कल्याणी के चालुक्य वंश की नींव डाली।**
* **एलोरा एवं एलिफेंटा (महाराष्ट्र) गुहामंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय ही हुआ।** एलोरा में 34 शैलकृत गुफाएँ हैं। इसमें 1 से 12 तक बौद्धों, 13 से 29 तक हिन्दुओं एवं 30 से 34 तक जैनों की गुफाएँ हैं। बौद्ध गुफाओं में सबसे प्रसिद्ध विश्वकर्मा गुफा (संख्या-10) है। इसमें एक चैत्य है। वहाँ पर दो मंजिली और तीन मंजिली गुफाएँ भी हैं, जिन्हें दो थल तथा तीन थल नाम दिया गया है। एलोरा की गुफा 15 में विष्णु को नरसिंह अर्थात पुरुष-सिंह के रूप दिखलाया गया है।
**नोट :** *एलोरा गुफाओं का सर्वप्रथम उल्लेख फ्रांसीसी यात्री थेविनेट ने 17वीं शताब्दी में किया था।*
* **राष्ट्रकूट शैव, वैष्णव, शाक्त सम्प्रदायों के साथ-साथ जैन धर्म के भी उपासक थे।** राष्ट्रकूटों ने अपने राज्यों में मुसलमान व्यापारियों को बसने तथा इस्लाम के प्रचार की स्वीकृति दी थी।
#### **यादव वंश**
* **देवगिरि के यादव वंश की स्थापना भिल्लम पंचम ने की।** इसकी राजधानी **देवगिरि** थी। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा **सिंघण (1210-1246)** था। इस वंश का अंतिम स्वतंत्र शासक **रामचन्द्र** था, जिसने अलाउद्दीन के सेनापति मलिक काफूर के सामने आत्मसमर्पण किया।
* **संगीतशास्त्री सारंगदेव राजा सिंघण के दरबारी थे जिन्होंने संगीत रत्नाकर नामक ग्रंथ की रचना की।**
#### **होयसल वंश**
* **द्वार समुद्र के होयसल वंश की स्थापना विष्णुवर्धन ने की थी।**
* **होयसल वंश, यादव वंश की एक शाखा थी।**
* **वेलूर में चेन्ना केशव मंदिर का निर्माण विष्णुवर्धन ने 1117 में किया था।**
* **होयसल वंश का अंतिम शासक वीर बल्लाल तृतीय था, जिसे मलिक काफूर ने हराया था।**
* **होयसल वंश की राजधानी द्वार समुद्र (आधुनिक हलेविड) था।**
#### **कदम्ब वंश**
* **कदम्ब वंश की स्थापना मयूर शर्मन ने की थी।** कदम्ब वंश की राजधानी **बनवासी** था।
#### **गंगवंश**
* **गंगवंश संस्थापक वज्रहस्त पंचम था।**
* **अभिलेखों के अनुसार गंगवंश के प्रथम शासक कोंकणी वर्मा था।**
* **गंगों की प्रारंभिक राजधानी कुवलाल (कोलार) थी, जो बाद में तलकाड हो गयी।**
* **'दत्तकसूत्र' पर टीका लिखने वाला गंग शासक माधव प्रथम था।**
#### **काकतीय वंश**
* **काकतीय वंश का संस्थापक बीटा प्रथम था,** जिसने नलगोंडा (हैदराबाद) में एक छोटे-से राज्य का गठन किया, जिसकी राजधानी **अमकोंड** थी। इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक **गणपति** था। रुद्रमादेवी गणपति की बेटी थी, जिसने रुद्रदेव महाराज का नाम ग्रहण किया, जिसने 35 वर्ष तक शासन किया।
* **गणपति ने अपनी राजधानी वारंगल में स्थानान्तरित कर ली थी।**
* **इस राजवंश का अंतिम शासक प्रताप रुद्र (1295-1323 ई.) था।**
* **रायगजकेसरी और दयागजकेसरी काकतीय वंश की उपाधियाँ हैं।** दयागजकेसरी की उपाधि काकतीय राजा प्रतापरुद्र को दी गई थी। रायगजकेसरी की उपाधि रुद्रमा देवी की थी, यह उपाधि उन्हें अपने पिता
से मिली थी। यह उपाधियाँ सिक्कों पर अंकित होती थी।
### **25. सीमावर्ती राजवंशों का अभ्युदय**
#### **पालवंश**
* **पालवंश का संस्थापक गोपाल (750 ई.) था।** इस वंश की राजधानी **मुंगेर** थी। पाल शासक बौद्ध धर्म के अनुयायी थे।
* **गोपाल ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।**
* **पालवंश का सबसे महान शासक धर्मपाल था जिसने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी।**
* **कन्नौज के लिए त्रिपक्षीय संघर्ष पालवंश, गुर्जर प्रतिहार वंश एवं राष्ट्रकूट वंश के बीच हुआ।** इसमें पालवंश की ओर से सर्वप्रथम **धर्मपाल** शामिल हुआ था।
* **ग्यारहवीं सदी के गुजराती कवि सोड्ढल ने धर्मपाल को 'उत्तरापथ स्वामी' की उपाधि से संबोधित किया है।** सोमपुर महाविहार का निर्माण धर्मपाल ने करवाया था।
* **ओदन्तपुरी (बिहार) के प्रसिद्ध बौद्धमठ का निर्माण देवपाल ने करवाया था।**
* **जावा के शैलेन्द्रवंशी शासक बालपुत्र देव के अनुरोध पर देवपाल ने उसे नालंदा में एक बौद्धविहार बनवाने के लिए पाँच गाँव दान में दिए थे।**
* **गौड़ीरीति नामक साहित्यिक विद्या का विकास पाल शासकों के समय में हुआ।**
#### **सेनवंश**
* **सेनवंश की स्थापना सामन्त सेन ने राढ़ में की थी।**
* **इसकी राजधानी नदिया (लखनौती) थी।**
* **सेनवंश के प्रमुख शासक विजयसेन, बल्लाल सेन एवं लक्ष्मण सेन थे।**
* **सेनवंश का प्रथम स्वतंत्र शासक विजयसेन था, जो शैवधर्म का अनुयायी था।**
* **दानसागर एवं अद्भुत सागर नामक ग्रंथ की रचना सेन शासक बल्लालसेन ने की थी।** अद्भुत सागर को लक्ष्मण सेन ने पूर्णरूप दिया था।
* **लक्ष्मण सेन की राजसभा में गीतगोविन्द के लेखक जयदेव, पवनदूत के लेखक धोयी एवं ब्राह्मणसर्वस्व के लेखक हलायुध रहते थे।**
* **हलायुध लक्ष्मण सेन का प्रधान न्यायाधीश एवं मुख्यमंत्री था।**
* **विजयसेन ने देवपाड़ा में प्रद्युम्नेश्वर मंदिर (शिव का विशाल मंदिर) की स्थापना की।**
* **सेन राजवंश प्रथम राजवंश था, जिसने अपना अभिलेख सर्वप्रथम हिन्दी में उत्कीर्ण करवाया।**
* **लक्ष्मण सेन बंगाल का अंतिम हिन्दू शासक था।**
#### **कश्मीर के राजवंश**
* **कश्मीर पर शासन करनेवाले शासक वंश कालक्रम से इस प्रकार थे— कार्कोट वंश, उत्पल वंश, लोहार वंश।**
* **627 ई. में दुर्लभवर्धन नामक व्यक्ति ने कश्मीर में कार्कोट वंश (हिंदू वंश) की स्थापना की थी।** ह्वेनसांग ने उसके शासनकाल में कश्मीर की यात्रा की।
* **कार्कोट वंश का सबसे शक्तिशाली राजा ललितादित्य मुक्तापीड था।**
* **कश्मीर का मार्तण्ड-मंदिर का निर्माण ललितादित्य मुक्तापीड के द्वारा कराया गया था।**
* **कार्कोट वंश के बाद कश्मीर पर उत्पल वंश का शासन हुआ।** इस वंश का संस्थापक **अवन्तिवर्मन** था। अवन्तिपुर नामक नगर की स्थापना अवन्तिवर्मन ने की थी।
* **अवन्तिवर्मन के अभियन्ता सुय्य ने सिंचाई के लिए नहरों का निर्माण करवाया।**
* **980 ई. में उत्पलवंश की रानी दिड्ढा एक महत्वाकांक्षिणी शासिका हुई।**
* **उत्पल वंश के बाद कश्मीर पर लोहारवंश का शासन हुआ।**
* **लोहारवंश का संस्थापक संग्रामराज था।** संग्रामराज के बाद अनन्त राजा हुआ। इसकी पत्नी सूर्यमती ने प्रशासन को सुधारने में उसकी सहायता की।
* **लोहार वंश का शासक हर्ष विद्वान, कवि तथा कई भाषाओं का ज्ञाता था।**
* **कल्हण हर्ष का आश्रित कवि था।**
* **जयसिंह लोहार वंश का अन्तिम शासक था, जिसने 1128 ई. से 1155 ई. तक शासन किया।** जयसिंह के शासन के साथ ही कल्हण की *राजतरंगिणी* का विवरण समाप्त हो जाता है।
#### **कामरूप का वर्मन वंश**
* **चौथी शताब्दी के मध्य कामरूप में वर्मनवंश का उदय हुआ।** इस वंश की प्रतिष्ठा का संस्थापक **पुष्यवर्मन** था। इसकी राजधानी **प्राग्ज्योतिष** नामक स्थान पर थी।
* **कालान्तर में कामरूप पाल साम्राज्य का एक अंग बन गया।**
### **26. राजपूत राजवंशों की उत्पत्ति**
#### **गुर्जर प्रतिहार वंश**
* **मालवा का शासक नागभट्ट प्रथम गुर्जर प्रतिहार वंश का संस्थापक था।**
* **नागभट्ट-II को राष्ट्रकूट सम्राट गोविन्द-III ने हराया था।**
* **प्रतिहार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली व प्रतापी राजा मिहिरभोज था।** इसने अपनी राजधानी **कन्नौज** में बनाई थी। वह विष्णुभक्त था, उसने विष्णु के सम्मान में **आदि वराह** की उपाधि ग्रहण की।
* **राजशेखर प्रतिहार शासक महेन्द्रपाल के दरबार में रहते थे।**
* **इस वंश का अंतिम राजा यशपाल (1036 ई.) था।**
* **दिल्ली नगर की स्थापना तोमर नरेश अनंगपाल ने ग्यारहवीं सदी के मध्य में की।**
**नोट :** *अरब यात्री सुलेमान प्रतिहार राजा भोज / वत्सराज के शासन काल में भारत आया था।*
#### **गहड़वाल (राठौर) राजवंश**
* **गहड़वाल वंश का संस्थापक चन्द्रदेव था।** इसकी राजधानी **वाराणसी** थी।
* **इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा गोविन्दचन्द्र था।** इसका मंत्री लक्ष्मीधर शास्त्रों का प्रकाण्ड पंडित था, जिसने **कृत्यकल्पतरु** नामक ग्रंथ लिखा था।
* **गोविन्दचंद्र की एक रानी कुमारदेवी ने सारनाथ में धर्मचक्र-जिन बिहार बनवायी।**
* **पृथ्वीराज-III ने स्वयंवर से जयचन्द की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर लिया था।**
* **इस वंश का अंतिम शासक जयचन्द था, जिसे गोरी ने 1194 ई. के चन्दावर युद्ध में मार डाला।**
#### **चाहमान या चौहान वंश**
* **चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव था।** इस वंश की प्रारंभिक राजधानी **अहिच्छत्र** थी। बाद में अजयराज द्वितीय ने अजमेर नगर की स्थापना की और उसे राजधानी बनाया।
* **इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अर्णोराज के पुत्र विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव (1153-1163 ई.) हुआ, जिसने हरिकेलि नामक संस्कृत नाटक की रचना की।**
* **सोमदेव विग्रहराज-IV के राजकवि थे।** इन्होंने **ललित विग्रहराज** नामक नाटक लिखा।
* **अढ़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद शुरू में विग्रहराज-IV द्वारा निर्मित एक विद्यालय था।**
* **पृथ्वीराज-III इस वंश का अंतिम शासक था।** **चन्दवरदाई** पृथ्वीराज तृतीय का राजकवि था, जिसकी रचना **पृथ्वीराजरासो** है।
* **रणथम्भौर के जैन मंदिर का शिखर पृथ्वीराज III ने बनवाया था।**
* **तराइन का प्रथम युद्ध 1191 ई. में
हुआ, जिसमें पृथ्वीराज तृतीय की विजय एवं गोरी की हार हुई।**
* **तराइन के द्वितीय युद्ध 1192 ई. में हुआ, जिसमें गौरी की विजय एवं पृथ्वीराज तृतीय की हार हुई।**
#### **परमार वंश**
* **परमार वंश का संस्थापक उपेन्द्रराज था।** इसकी राजधानी **धारा नगरी** थी (प्राचीन राजधानी—उज्जैन)। परमार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक राजा भोज था। राजा भोज ने भोपाल के दक्षिण में भोजपुर नामक झील का निर्माण करवाया।
* **नैषधीयचरित के लेखक श्रीहर्ष व प्रबन्धचिन्तामणि के लेखक मेरुतुंग थे।**
* **राजा भोज ने चिकित्सा, गणित एवं व्याकरण पर अनेक ग्रंथ लिखे।** भोजकृत 'युक्तिकल्पतरु' में वास्तुकला के साथ-साथ विविध वैज्ञानिक यंत्रों व उनके उपयोग का उल्लेख है।
* **नवसाहसांकचरित के रचयिता पदमगुप्त, दशरूपक के रचयिता धनंजय, धनिक, हलायुध एवं अमितगति जैसे विद्वान वाक्पति मुंज के दरबार में रहते थे।**
* **कविराज की उपाधि से विभूषित शासक था—राजा भोज।**
* **भोज ने अपनी राजधानी में सरस्वती मंदिर का निर्माण करवाया था।** इस मंदिर के परिसर में संस्कृत विद्यालय भी खोला गया था।
* **राजा भोज के शासनकाल में धारा नगरी विद्या व विद्वानों का प्रमुख केंद्र थी।** इसने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर का निर्माण करवाया।
* **भोजपुर नगर की स्थापना राजा भोज ने की थी।**
* **परमार वंश के बाद तोमर वंश का, उसके बाद चाहमान वंश का और अन्ततः 1297 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नसरत खाँ और उलुग खाँ ने मालवा पर अधिकार कर लिया।**
#### **चन्देल वंश**
* **प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद बुंदेलखंड की भूमि पर चन्देल वंश का स्वतंत्र राजनीतिक इतिहास प्रारंभ हुआ।** बुंदेलखंड का प्राचीन नाम जेजाकभुक्ति है। चन्देल वंश का संस्थापक **नन्नुक (831 ई.)** था।
* **इसकी राजधानी खजुराहो थी।** प्रारंभ में इसकी राजधानी कालिंजर (महोबा) थी। राजा धंग ने अपनी राजधानी कालिंजर से खजुराहो में स्थानान्तरित की थी।
* **चन्देल वंश का प्रथम स्वतंत्र एवं सबसे प्रतापी राजा यशोवर्मन था।**
* **यशोवर्मन ने कन्नौज पर आक्रमण कर प्रतिहार राजा देवपाल को हराया तथा उससे एक विष्णु की प्रतिमा प्राप्त की, जिसे उसने खजुराहो के विष्णु मंदिर में स्थापित की।**
* **धंग ने जिननाथ, विश्वनाथ एवं वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।** कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण धंगदेव द्वारा 999 ई. में किया गया। धंग ने गंगा-यमुना के संगम में शिव की आराधना करते हुए अपने शरीर का त्याग किया।
* **चन्देल शासक विद्याधर ने कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल की हत्या कर दी, क्योंकि उसने महमूद के आक्रमण का सामना किए बिना ही आत्मसमर्पण कर दिया था।**
* **विद्याधर ही अकेला ऐसा भारतीय नरेश था जिसने महमूद गज़नी की महत्वाकांक्षाओं का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया।**
* **चन्देल शासक कीर्तिवर्मन की राज्यसभा में रहनेवाले कृष्ण मिश्र ने 'प्रबोध चन्द्रोदय' की रचना की थी।** इन्होंने महोबा के समीप कीर्तिसागर नामक जलाशय का निर्माण किया।
* **आल्हा-ऊदल नामक दो सेनानायक परमर्दिदेव के दरबार में रहते थे, जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध करते हुए अपनी जान गँवायी थी।**
* **चन्देल वंश का अंतिम शासक परमर्दिदेव ने 1202 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक की अधीनता स्वीकार कर ली।** इस पर उसके मंत्री अजयदेव ने उसकी हत्या कर दी।
**नोट :** *चंदेल वंश के शासक यशोवर्मन ने 954 ई. में लक्ष्मण मंदिर का निर्माण करवाया था। इस मंदिर की योजना पंचायतन किस्म की है। एक अर्द्धमंडप, एक मंडप, एक महामंडप और विमान सहित गर्भगृह है। हर हिस्से की अपनी अलग छत है जो पीछे की ओर उठी हुई है। गर्भगृह की बाहरी दीवारें और प्रदक्षिणापथ की बाहरी एवं भीतरी दीवारें प्रतिमाओं से सजी हुई हैं। बाहरी दीवारें अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाओं तथा कामोद्दीप आकृतियों से सुसज्जित हैं। खजुराहो के मंदिर अपनी कामुक प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। मंदिर के चारों कोणों पर देवालय बने हैं जिनमें तीन देवालयों में विष्णु की और एक में सूर्य की प्रतिमा है जिसे देवालय की छत पर बनी केंद्रीय प्रतिमा से पहचाना जा सकता है।'*
#### **सोलंकी वंश अथवा गुजरात के चालुक्य शासक**
* **सोलंकी वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था।** इसकी राजधानी **अनहिलवाड़** थी। मूलराज प्रथम शैव धर्म का अनुयायी था।
* **भीम प्रथम के शासनकाल में महमूद गज़नी ने सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण किया।**
* **भीम प्रथम के सामन्त विमल ने आबू पर्वत पर दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मंदिर बनवाया।**
* **सोलंकी वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक जयसिंह सिद्धराज था।**
* **प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचन्द्र जयसिंह सिद्धराज के दरबार में था।**
* **माउण्ट आबू पर्वत (राजस्थान) पर एक मंडप बनाकर जयसिंह सिद्धराज ने अपने सातों पूर्वजों की गजारोही मूर्तियों की स्थापना की।**
* **मोढेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण सोलंकी राजाओं के शासनकाल में हुआ था।** सिद्धपुर में रुद्रमहाकाल के मंदिर का निर्माण जयसिंह सिद्धराज ने किया था।
* **सोलंकी शासक कुमारपाल जैन-मतानुयायी था।** वह जैन धर्म के अंतिम राजकीय प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध है।
* **सोलंकी वंश का अंतिम शासक भीम द्वितीय था।**
* **भीम-II के एक सामन्त लवण प्रसाद ने गुजरात में बघेल वंश की स्थापना की थी।**
* **बघेल वंश का कर्ण-II गुजरात का अंतिम हिन्दू शासक था, इसने अलाउद्दीन खिलजी की सेनाओं का मुकाबला किया था।**
#### **कलचुरी-चेदि राजवंश**
* **कलचुरी वंश का संस्थापक कोक्कल था।** इसकी राजधानी **त्रिपुरी** थी।
* **कलचुरी वंश का एक शक्तिशाली शासक गांगेयदेव था, जिसने 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण की।** पूर्व-मध्यकाल में स्वर्ण सिक्कों के विलुप्त हो जाने के पश्चात् इन्होंने सर्वप्रथम इसे प्रारंभ करवाया।
* **कलचुरी वंश का सबसे महान शासक कर्णदेव था, जिसने कलिंग पर विजय प्राप्त की और त्रिकलिंगाधिपति की उपाधि धारण की।**
* **प्रसिद्ध कवि राजशेखर कलचुरी के दरबार में ही रहते थे।**
#### **सिसोदिया वंश**
* **सिसोदिया वंश के शासक अपने को सूर्यवंशी कहते थे, जो मेवाड़ पर शासन करते थे।** मेवाड़ की राजधानी **चित्तौड़** थी।
* **अपनी विजयों के उपलक्ष्य में विजयस्तम्भ का निर्माण राणा कुम्भा ने चित्तौड़ में करवाया।**
* **खतौली का युद्ध 1518 में राणा साँगा व इब्राहिम लोदी के बीच हुआ।**
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