Sabhyataye 2


**इतिहास** (Page 5)

### **3. सिन्धु सभ्यता**

 * रेडियोकार्बन C^{14} जैसी नवीन विश्लेषण-पद्धति के द्वारा सिन्धु सभ्यता की सर्वमान्य तिथि 2400 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व* मानी गयी है। इसका विस्तार त्रिभुजाकार है।

> **नोट:** तिथि निर्धारण की कार्बन-14 (C^{14}) की खोज अमेरिका के प्रसिद्ध रसायन शास्त्री वी. एफ. लिबि द्वारा 1946 ई. में की गयी थी। इस पद्धति में जिस पदार्थ में कार्बन-14 की मात्रा जितनी ही कम रहती है, वह उतनी ही प्राचीन मानी जाती है।

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 * सिन्धु सभ्यता की खोज 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने की।

 * सिन्धु सभ्यता को आद्य ऐतिहासिक (*Protohistoric*) अथवा कांस्य (*Bronze*) युग में रखा जा सकता है। इस सभ्यता के मुख्य निवासी द्रविड़ एवं भूमध्यसागरीय थे।

 * सर जान मार्शल (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के तत्कालीन महानिदेशक) ने 1924 ई. में सिन्धु घाटी सभ्यता नामक एक उन्नत नगरीय सभ्यता पाए जाने की विधिवत घोषणा की।

 * सिन्धु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल दाश्क नदी के किनारे स्थित सुतकांगेडोर (बलूचिस्तान), पूर्वी पुरास्थल हिण्डन नदी के किनारे आलमगीरपुर (जिला मेरठ, उत्तर प्र.), उत्तरी पुरास्थल चिनाव नदी के तट पर अखनूर के निकट माँदा (जम्मू-कश्मीर) व दक्षिणी पुरास्थल गोदावरी नदी के तट पर दाइमाबाद (जिला अहमदनगर, महाराष्ट्र) ।

 * सिन्धु सभ्यता या सैंधव सभ्यता नगरीय सभ्यता थी। सैंधव सभ्यता से प्राप्त परिपक्व अवस्था वाले स्थलों में केवल 6 को ही बड़े नगर की संज्ञा दी गयी है; ये हैं—मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, गणवारीवाला, राखीगढ़ी, धौलावीरा एवं कालीबंगन।

> **नोट:** धौलावीरा भारत में सिंधु घाटी सभ्यता की पहली साइट है जिसे यूनेस्को ने 2021 में विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया है।

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 * स्वतंत्रता-प्राप्ति पश्चात् हड़प्पा संस्कृति के सर्वाधिक स्थल गुजरात में खोजे गये हैं।

> **नोट:** सिन्धु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा स्थल मोहनजोदड़ो है, जबकि भारत में इसका सबसे बड़ा स्थल राखीगढ़ी (घग्घर नदी) है जो हरियाणा के हिसार जिला में स्थित है। इसकी खोज 1963 ई. में सूरजभान ने की थी।

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 * लोथल एवं सुतकोतदा—सिन्धु सभ्यता का बन्दरगाह था।

 * जुते हुए खेत और नक्काशीदार ईंटों के प्रयोग का साक्ष्य कालीबंगन से प्राप्त हुआ है।

 * मोहनजोदड़ो से प्राप्त स्नानागार संभवतः सैंधव सभ्यता की सबसे बड़ी इमारत है, जिसके मध्य स्थित स्नानकुंड 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा एवं 2.43 मीटर गहरा है। इस स्नानकुंड में दो तरफ से उतरने के लिए सीढ़ियाँ बनाई गयी थीं और चारों ओर कमरे बनाए गए थे। इसमें भरने के लिए पानी कुँए से निकाला जाता था, उपयोग के बाद इसे खाली कर दिया जाता था। शायद यहाँ विशिष्ट नागरिक विशेष अवसरों पर स्नान किया करते थे।

 * अग्निकुण्ड (यज्ञ वेदी) लोथल एवं कालीबंगन से प्राप्त हुए हैं।

 * मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक शील पर तीन मुख वाले देवता (पशुपति नाथ) की मूर्ति मिली है। उनके चारों ओर हाथी, गेंडा, चीता एवं भैंसा विराजमान हैं।

 * मोहनजोदड़ो से नर्तकी की एक कांस्य मूर्ति मिली है।

 * हड़प्पा की मुहरों पर सबसे अधिक एक शृंगी पशु का अंकन मिलता है। यहाँ से प्राप्त एक आयताकार मुहर में स्त्री के गर्भ से निकलता पौधा दिखाया गया है।

 * मनके बनाने के कारखाने लोथल एवं चन्हूदड़ो में मिले हैं।

 * सिन्धु सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक है। यह लिपि दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी। जब अभिलेख एक से अधिक पंक्तियों का होता था तो पहली पंक्ति दायीं से बायीं और दूसरी बायीं से दायीं ओर लिखी जाती थी।

> **नोट:** लेखनकला की उचित प्रणाली विकसित करने वाली पहली सभ्यता सुमेरिया की सभ्यता थी।

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 * सिन्धु सभ्यता के लोगों ने नगरों तथा घरों के विन्यास के लिए ग्रीड पद्धति अपनाई।

 * घरों के दरवाजे और खिड़कियाँ सड़क की ओर न खुलकर पिछवाड़े की ओर खुलते थे। केवल लोथल नगर के घरों के दरवाजे मुख्य सड़क की ओर खुलते थे।

 * सिन्धु सभ्यता में मुख्य फसल थी—गेहूँ और जौ।

 * सैंधव वासी मिठास के लिए शहद का प्रयोग करते थे।

 * मिट्टी से बने हल का साक्ष्य बनमाली से मिला है।

 * रंगपुर एवं लोथल से चावल के दाने मिले हैं, जिनसे धान की खेती होने का प्रमाण मिलता है। चावल के प्रथम साक्ष्य लोथल से ही प्राप्त हुए हैं।

 * सुतकोतदा, कालीबंगन एवं लोथल से सैंधवकालीन घोड़े के अस्थिपंजर मिले हैं।

 * तौल की इकाई संभवतः 16 के अनुपात में थी।

### **सैंधव सभ्यता के प्रमुख स्थल : नदी, उत्खननकर्ता एवं वर्तमान स्थिति**


**6** | **लूसेंट सामान्य ज्ञान**

 * सैंधव सभ्यता के लोग यातायात के लिए दो पहियों एवं चार पहियों वाली बैलगाड़ी या भैंसागाड़ी का उपयोग करते थे।

 * मेसोपोटामिया के अभिलेखों में वर्णित 'मेलुहा' शब्द का अभिप्राय सिन्धु सभ्यता से ही है।

 * संभवतः हड़प्पा संस्कृति का शासन वणिक वर्ग के हाथों में था।

 * पिग्गट ने हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो को एक विस्तृत साम्राज्य की जुड़वाँ राजधानी कहा है।

 * सिन्धु सभ्यता के लोग धरती को उर्वरता की देवी मानकर उसकी पूजा किया करते थे।

 * वृक्ष-पूजा एवं शिव-पूजा के प्रचलन के साक्ष्य भी सिन्धु सभ्यता से मिलते हैं।

 * स्वास्तिक चिह्न संभवतः हड़प्पा सभ्यता की देन है। इस चिह्न से सूर्योपासना का अनुमान लगाया जाता है। सिन्धु घाटी के नगरों में किसी भी मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।

 * सिन्धु सभ्यता में मातृदेवी की उपासना सर्वाधिक प्रचलित थी।

 * पशुओं में कुबड़ वाला साँड़ इस सभ्यता के लोगों के लिए विशेष पूजनीय था।

 * स्त्री मृण्मूर्तियाँ (मिट्टी की मूर्तियाँ) अधिक मिलने से ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सैंधव समाज मातृसत्तात्मक था।

 * सैंधववासी सूती एवं ऊनी वस्त्रों का प्रयोग करते थे।

 * मनोरंजन के लिए सैंधववासी मछली पकड़ना, शिकार करना, पशु-पक्षियों को आपस में लड़ाना, चौपड़ और पासा खेलना आदि साधनों का प्रयोग करते थे।

 * सिन्धु सभ्यता के लोग काले रंग से डिजाइन किये हुए लाल मिट्टी के बर्तन बनाते थे।

 * सिन्धु घाटी के लोग तलवार से परिचित नहीं थे।

 * कालीबंगन एक मात्र हड़प्पाकालीन स्थल था, जिसका निचला शहर (सामान्य लोगों के रहने हेतु) भी किले से घिरा हुआ था। कालीबंगन का अर्थ है 'काली चूड़ियाँ'। यहाँ से पूर्व हड़प्पा स्तरों के खेत जोते जाने के और अग्निपूजा की प्रथा के प्रमाण मिले हैं।

 * पर्दा-प्रथा एवं वेश्यावृत्ति सैंधव सभ्यता में प्रचलित थी।

 * शवों को जलाने एवं गाड़ने यानी दोनों प्रथाएँ प्रचलित थीं। हड़प्पा में शवों को दफनाने जबकि मोहनजोदड़ो में जलाने की प्रथा विद्यमान थी। लोथल एवं कालीबंगा में युग्म समाधियाँ मिली हैं।

 * सैंधव सभ्यता के विनाश का संभवतः सबसे प्रभावी कारण बाढ़ था।

 * आग में पकी हुई मिट्टी को 'टेराकोटा' कहा जाता है।

### **सिन्धु काल में विदेशी व्यापार**

| आयातित वस्तुएँ | प्रदेश |



### **4. वैदिक सभ्यता**

 * वैदिककाल का विभाजन दो भागों 1. ऋग्वैदिक काल (1500-1000 ई. पू.) और 2. उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई. पू.) में किया गया है।

 * आर्य सर्वप्रथम पंजाब एवं अफगानिस्तान में बसे। मैक्समूलर ने आर्यों का मूल निवास स्थान मध्य एशिया को माना है। आर्यों द्वारा निर्मित सभ्यता *वैदिक सभ्यता* कहलाई। यह एक ग्रामीण सभ्यता थी। आर्यों की भाषा *संस्कृत* थी।

> **नोट:** आर्य शब्द भाषा-समूह को इंगित करता है।

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 * आर्यों के प्रशासनिक इकाई आरोही क्रम से इन पाँच भागों में बँटा था—कुल, ग्राम, विश, जन, राष्ट्र। ग्राम के मुखिया *ग्रामिणी*, विश का प्रधान *विशपति* एवं जन के शासक *राजन्* कहलाते थे।

 * राज्याधिकारियों में पुरोहित एवं सेनानी प्रमुख थे। वसिष्ठ रूढ़िवादी एवं विश्वामित्र उदार पुरोहित थे।

 * सूत, रथकार व कम्मादि नामक अधिकारी 'रत्नी' कहे जाते थे। इनकी संख्या राजा सहित करीब 12 हुआ करती थी।

 * पुरप—दुर्गपति एवं स्पष्ट—जनता की गतिविधियों को देखने वाले गुप्तचर होते थे।

 * वाजपति : गोचर भूमि का अधिकारी होता था।

 * उग्र : अपराधियों को पकड़ने का कार्य करता था।

 * भागदुघ : राजस्व कर एकत्र करनेवाला अधिकारी था।

### **दिशा (उत्तर वैदिक शब्द) — राजा का नाम**



> **नोट:** ऋग्वेद में किसी तरह के न्यायाधिकारी का उल्लेख नहीं है।

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 * सभा एवं समिति राजा को सलाह देने वाली संस्था थी। सभा श्रेष्ठ एवं संभ्रांत लोगों की संस्था थी जबकि समिति सामान्य जनता का प्रतिनिधित्व करती थी। इसके अध्यक्ष को *ईशान* कहा जाता था। स्त्रियाँ सभा एवं समितियों में भाग ले सकती थीं।

 * युद्ध में कबीले का नेतृत्व राजा करता था। युद्ध के लिए *गविष्टि* शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ है—गायों की खोज।

 * दशराज्ञ युद्ध का उल्लेख ऋग्वेद के 7वें मण्डल में है, यह युद्ध परुष्णी (रावी) नदी के तट पर सुदास एवं दस जनों के बीच लड़ा गया, जिसमें सुदास विजयी हुआ।

 * उपनिषदों की कुल संख्या है: **108**

 * ऋग्वैदिक समाज चार वर्णों में विभक्त था। ये वर्ण थे—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। यह विभाजन व्यवसाय पर आधारित था। ऋग्वेद के 10वें मण्डल के *पुरुषसूक्त* में चतुर्वर्णों का उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है कि ब्राह्मण परम पुरुष के मुख से, क्षत्रिय उनकी भुजाओं से, वैश्य उनकी जाँघों से एवं शूद्र उनके पैरों से उत्पन्न हुए हैं।

 * महापुराणों की संख्या है: **18**

 * वेदांग की संख्या है: **6**

 * आर्यों का समाज पितृप्रधान था। समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार या कुल थी, जिसका मुखिया पिता होता था, जिसे *कुलप* कहा जाता था।

 * स्त्रियाँ इस काल में अपने पति के साथ यज्ञ-कार्य में भाग लेती थीं।

 * बाल-विवाह एवं पर्दा-प्रथा का प्रचलन नहीं था।

 * विधवा अपने मृतक पति के छोटे भाई (देवर) से विवाह कर सकती थी।

 * स्त्रियाँ शिक्षा ग्रहण करती थीं। ऋग्वेद में लोपामुद्रा, घोषा, सिकता, आपला एवं विश्वास जैसी विदुषी स्त्रियों का वर्णन है। गार्गी ने याज्ञवल्क्य को वाद-विवाद की चुनौती दी थी।

### **प्रमुख दर्शन एवं उनके प्रवर्तक**

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 * जीवन भर अविवाहित रहनेवाली महिलाओं को *अमाजू* कहा जाता था।

 * जीविकोपार्जन के लिए वेद-वेदांग पढ़ानेवाला अध्यापक *उपाध्याय* कहलाता था।

 * आर्यों का मुख्य पेय-पदार्थ *सोमरस* था। यह वनस्पति से बनाया जाता था। आर्य मुख्यतः तीन प्रकार के वस्त्रों का उपयोग करते थे—1. वास, 2. अधिवास और 3. उष्णीष। अन्दर पहननेवाले कपड़े को *नीवि* कहा जाता था।

 * आर्यों के मनोरंजन के मुख्य साधन थे—संगीत, रथदौड़, घुड़दौड़ एवं द्यूतक्रीड़ा। आर्यों का मुख्य व्यवसाय पशु

पालन एवं कृषि था।

 * महर्षि कणाद को भारतीय परमाणुवाद का जनक कहा गया है।

**इतिहास** | **7**

 * गाय को अघन्या—न मारे जाने योग्य पशु की श्रेणी में रखा गया था। गाय की हत्या करने वाले या उसे घायल करने वाले के लिए वेदों में मृत्युदंड अथवा देश से निकाले की व्यवस्था की गई है।

 * आर्यों का प्रिय पशु घोड़ा एवं सर्वाधिक प्रिय देवता इन्द्र थे।

 * आर्यों द्वारा खोजी गयी धातु लोहा थी जिसे श्याम अयस कहा जाता था। ताँबे को लोहित अयस कहा जाता था।

> **नोट:** भारतीयों को लोहे का ज्ञान ईसापूर्व आठवीं सदी में प्राप्त हुआ।

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 * व्यापार हेतु दूर-दूर तक जानेवाला व्यक्ति को पणि कहते थे।

 * लेन-देन में वस्तु-विनिमय की प्रणाली प्रचलित थी।

 * ऋण देकर ब्याज लेने वाले को वेकनॉट (सूदखोर) कहा जाता था।

 * मनुष्य एवं देवता के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभानेवाले देवता के रूप में अग्नि की पूजा की जाती थी।

 * ऋग्वेद में उल्लिखित नदियों में सरस्वती सबसे पवित्र मानी जाती थी। ऋग्वेद में गंगा का एक बार और यमुना का उल्लेख तीन बार हुआ है। इसमें सिन्धु नदी का उल्लेख सर्वाधिक बार हुआ है।

 * उत्तरवैदिक काल में इन्द्र के स्थान पर प्रजापति सर्वाधिक प्रिय देवता हो गये थे। विष्णु के तीन पगों की कल्पना का विकास उत्तरवैदिक काल में ही हुआ।

 * उत्तरवैदिक काल में राजा के राज्याभिषेक के समय राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता था।

 * उत्तरवैदिक काल में वर्ण व्यवसाय की बजाय जन्म के आधार पर निर्धारित होने लगे थे।

### **ऋग्वैदिककालीन नदियाँ**

| प्राचीन नाम | आधुनिक नाम |

| **क्रुभु** | कुर्रम |

| **कुभा** | काबुल |

| **वितस्ता** | झेलम |

| **आस्किनी** | चिनाव |

| **परुष्णी** | रावी |

| **शतुद्रि** | सतलज |

| **विपाशा** | व्यास |

| **सदानीरा** | गंडक |

| **दृषद्वती** | घग्घर |

| **गोमती** | गोमल |

| **सुवस्तु** | स्वात् |

### **ऋग्वैदिककालीन देवता**

| देवता | संबंध |

| **इन्द्र** | युद्ध का नेता एवं वर्षा का देवता। |

| **अग्नि** | देवता एवं मनुष्य के बीच मध्यस्थ। |

| **वरुण** | पृथ्वी एवं सूर्य के निर्माता, समुद्र का देवता, विश्व के नियामक व शासक, सत्य का प्रतीक, ऋतु-परिवर्तन व दिन-रात का कर्त्ता। |

| **द्यौ** | आकाश का देवता (सबसे प्राचीन)। |

| **सोम** | वनस्पति देवता। |

| **उषा** | प्रगति एवं उत्थान देवता। |

| **आश्विन** | विपत्तियों को हरनेवाले देवता। |

| **पूषन** | पशुओं का देवता। |

| **विष्णु** | विश्व के संरक्षक एवं पालनकर्त्ता। |

| **मरुत** | आँधी-तूफान का देवता। |

 * उत्तरवैदिक काल में हल को सिरा व हल रेखा को सीता कहा जाता था।

 * उत्तरवैदिक काल में निष्क और शतमान मुद्रा की इकाइयाँ थीं। सिक्कों के चलन का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

 * सांख्य दर्शन भारत के सभी दर्शनों में सबसे प्राचीन है। इसके अनुसार मूल तत्व पच्चीस हैं, जिनमें प्रकृति पहला तत्व है।

 * **'सत्यमेव जयते'** मुण्डकोपनिषद् से लिया गया है। इसी उपनिषद् में यज्ञ की तुलना टूटी नाव से की गयी है।

 * ईसा पूर्व दूसरी सदी में राजाओं के उपयुक्त यज्ञवेदी बनाने के लिए आपस्तम्ब व्यावहारिक ज्यामिति की रचना की।

 * गायत्री मंत्र सावित्री नामक देवता को संबोधित है, जिसका संबंध ऋग्वेद से है। लोगों को आर्य बनाने के लिए विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र की रचना की।

 * श्राद्ध की प्रथा पहले-पहल दत्तात्रेय ऋषि के बेटे निमि ने शुरू की।

 * उत्तरवैदिक काल में कौशाम्बी नगर में प्रथम बार पक्की ईंटों का प्रयोग किया गया है।

 * महाकाव्य दो हैं—महाभारत एवं रामायण। 'महाभारत' का पुराना नाम जयसंहिता है। यह विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है।

 * गोत्र नामक संस्था का जन्म उत्तरवैदिक काल में हुआ।

### **दर्शन विचारधाराएँ**

 * **रूढ़िवाद विचार धारा :** इस संप्रदाय के प्रस्तावक वेदों की प्रमाणिकता पर सवाल नहीं उठाते थे। इनके अनुसार वेद मोक्ष का रहस्य छिपाए सर्वोच्च प्रकाशित धर्मग्रंथ हैं। छह उप संप्रदायों सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा और वेदांत को षड्दर्शन कहा जाता था।

 * **सांख्य विचारधारा :** सांख्य दर्शनशास्त्र की प्राचीनतम विचार पद्धति है। सांख्य का शाब्दिक अर्थ गिनना होता है। इस विचार धारा के अनुसार बाह्य प्रभाव या कारक नहीं, बल्कि आत्म ज्ञान ही मोक्ष की ओर ले जाता है। यह विचारधारा द्वैतवाद में विश्वास रखती है, अर्थात्—आत्मा तथा पदार्थ दो पृथक सत्ताएँ हैं। यह अवधारणा सभी ज्ञान का आधार है। इस ज्ञान को तीन मुख्य अवधारणाओं द्वारा प्राप्त किया जा सकता है: प्रत्यक्षः अनुभूति, अनुमान : निष्कर्ष, शब्द : श्रवण। यह विचारधारा अन्वेषण की अपनी वैज्ञानिक प्रणाली के लिए प्रसिद्ध रही है।

### **दर्शन विचारधाराएँ**

| रूढ़िवादी / आस्तिक | नास्तिक |

| सांख्य | बौद्ध धर्म |

| योग | जैन धर्म |

| न्याय | लोकायत |

| वैशेषिक | अज्ञान |

| मीमांसा | आजीविक |

| वेदान्त | |

### **दर्शन — प्रवर्तक**

| दर्शन | प्रवर्तक |

| **सांख्य** | कपिल |

| **योग** | पतंजलि |

| **न्याय** | गौतम |

| **वैशेषिक** | कणाद |

| **मीमांसा** | जैमिनी |

| **वेदांत** | बादरायण |

 * **योग विचारधारा :** इसके अनुसार मानव शारीरिक प्रयोग तथा ध्यान का प्रयोग कर मुक्ति प्राप्त कर सकता है। मुक्ति प्राप्त करने के साधन हैं— यम *(स्व-नियंत्रण का अभ्यास करना)*, नियम *(व्यक्ति के जीवन को संचालित करने वाले नियमों का पालन)*, प्रत्याहार *(विषय का चयन)*, धारणा *(मन को स्थिर करना)*, ध्यान *(चयनित विषय पर ध्यान एकाग्र करना)* एवं समाधि *(मन तथा पिंड का विलय ही स्वयं के पूर्ण रूप से विच्छेद होने का कारण है)*।

 * **न्याय विचारधारा :** इसमें मुक्ति प्राप्त करने के लिए तर्कपूर्ण चिंतन पर विश्वास किया जाता है। इस विचारधारा का मानना है कि निष्कर्ष, श्रवण तथा उपमा जैसे तर्क सम्मत साधनों का प्रयोग कर मनुष्य किसी भी समस्या की सत्यता जाँच कर सकता है। इसका मानना था कि ईश्वर ने न केवल ब्रह्माण्ड की रचना की है बल्कि वह उसका पालन और संहार भी करते हैं।

 * **वैशेषिक विचारधारा :** यह विचारधारा ब्रह्माण्ड की भौतिकीयता में विश्वास करती है। इसके अनुसार ब्रह्माण्ड का हर पदार्थ पाँच मुख्य तत्वों—अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी तथा आकाश से बना है। इस विचारधारा का दृष्टिकोण अत्यंत वैज्ञानिक है, इसके द्वारा परमाणु सिद्धांत का विकास भी हुआ।

 * **मीमांसा विचारधारा :** मीमांसा का वास्तविक अर्थ तर्क-पूर्ण चिंतन, विवेचन तथा अनुप्रयोग की कला है। यदि व्यक्ति को धार्मिक श्रेष्ठता, स्वर्ग तथा मुक्ति प्राप्त करनी है, तो उसे वेदों के द्वारा नियत सभी कर्तव्यों की पूर्ति करनी होगी। इस दर्शन का मुख्य बल वेदों के आनुष्ठानिक भाग पर था। मुक्ति की प्राप्ति हेतु व्यक्ति को वैदिक अनुष्ठानों का निष्पादन पुरोहितों की सहायता से करना होता है। इसलिए, इस दर्शन में विभिन्न वर्गों के बीच सामाजिक अंतर को निहित रूप से वैधता प्रदान की गयी। ब्रा

ह्मणों के द्वारा इसका प्रयोग लोगों पर वर्चस्व स्थापित करने में किया गया।

**8** | **लूसेंट सामान्य ज्ञान**

 * **वेदांत विचारधारा :** इस दर्शन के आधार का निर्माण करने वाले प्राचीनतम ग्रंथ वादरायण द्वारा लिखित ब्रह्मसूत्र या वेदान्त सूत्र थे। इस दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही इस जीवन की वास्तविकता है। शेष सभी बातें मिथ्या या माया है। इसके अनुसार स्व का ज्ञान हो जाने पर, वह स्वतः ही ब्रह्म की अनुभूति कर मुक्ति को प्राप्त हो जाएगा। यह तर्क ब्रह्म तथा आत्मा को अविनाशी तथा शाश्वत बना देता है।

 * **नास्तिक विचारधारा :** ये वेदों की मौलिकता पर विश्वास नहीं करते हैं और भगवान के अस्तित्व पर प्रश्न खड़े करते हैं। ये पाँच उपधाराओं में विभाजित हैं—बौद्ध, जैन, लोकायत, अज्ञान और आजीविक।

 * **लोकायत दर्शन या चार्वाक विचारधारा :** बृहस्पति ने इस विचारधारा की नींव रखी। इसकी चर्चा वेदों तथा बृहदारण्यक उपनिषद में भी मिलती है। इसके अनुसार ब्रह्मांड में केवल चार तत्व हैं—अग्नि, पृथ्वी, जल तथा वायु। इस विचारधारा के समर्थक आकाश की गणना पाँच आधारभूत तत्वों में नहीं करते हैं, क्योंकि यह मनुष्य के अनुभूति से परे है। इस विचारधारा के अनुसार, इस विश्व के परे कोई अन्य जगत नहीं है, इसीलिए मृत्यु मानव का अंत है तथा सुख-भोग ही मानव जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए। इसीलिए उन्होंने खाओ, पीओ और मस्त रहो के सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

 * **अज्ञान :** कट्टरपंथी संशयवाद में विश्वास करते थे। इसके अनुसार ज्ञान प्राप्त करना असंभव है। यदि यह संभव भी है तो मोक्ष प्राप्ति के लिए व्यर्थ है। इसका विश्वास था कि अनभिज्ञता सर्वोत्तम है।

 * **आजीविक :** इसकी स्थापना मक्खलिपुत्र गोशाल द्वारा ईसापूर्व छठी शताब्दी में की गई। ये बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म के विपरीत कर्म के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते। ये कर्म को भ्रामक मानते हैं। इसने बौद्ध एवं जैन धर्म के समान वेदों की सत्ता को नकारा था। उत्तर प्रदेश में श्रावस्ती आजीविकों का प्रमुख केन्द्र था। आजीविक संप्रदाय के मानने वाले निराकार आत्मा की अवधारणा के विपरीत आत्मा के भौतिक रूप में विश्वास करते थे। बिन्दुसार इसके अनुयायी थे। अशोक सातवें स्तंभ के राजादेश में आजीविकों का उल्लेख मिलता है।

> **नोट:** वेदांत दर्शन में उपनिषद्, भगवत गीता और ब्रह्मसूत्रों को ज्ञान का प्रमुख स्रोत माना जाता है। इन तीनों ग्रंथों को सामूहिक रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता है।

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 * वैष्णव धर्म के विषय में प्रारंभिक जानकारी उपनिषदों से मिलती है। इसका विकास भगवत धर्म से हुआ। नारायण के पूजक मूलतः पंचरात्र कहे जाते थे।

 * वैष्णव धर्म के प्रवर्तक कृष्ण थे, जो वृषण कबीले के थे और जिनका निवास स्थान मथुरा था।

 * कृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम छांदोग्य उपनिषद में देवकी-पुत्र और अंगिरस के शिष्य के रूप में हुआ है। वासुदेव कृष्ण का सबसे प्रारंभिक अभिलेखीय उल्लेख बेसनगर स्तम्भ अभिलेख में पाया गया है।

 * विष्णु के दस अवतारों का उल्लेख मत्स्यपुराण में मिलता है। दस अवतार इस प्रकार हैं—मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध एवं कल्कि। गुप्तकाल में विष्णु का वराह अवतार सर्वाधिक प्रसिद्ध था।

 * वैष्णव धर्म में ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सर्वाधिक महत्व भक्ति को दिया गया है।

**नोट :** *भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र में छः तिल्लियाँ हैं।*




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