History Prachin Bharat 1



इतिहास


भारत का इतिहास


उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में समुद्र तक फैला यह उपमहाद्वीप भारतीयवर्ष के नाम से ज्ञात है, जिसे महाकाव्य तथा पुराणों में ‘भारत’ अर्थात् ‘भरतों का देश’ तथा यहाँ के निवासियों को भारती अर्थात् भारत की संतान कहा गया है। भरत एक प्राचीन कबीले (उत्तर-पश्चिम में रहने वाले लोगों का एक समूह) का नाम था इसका उल्लेख ऋग्वेद के साथ भी मिलता है, बाद में इसका प्रयोग देश के लिए होने लगा। प्राचीन भारतीय अपने देश को जम्बूद्वीप, अर्थात् जम्बू (जामुन) वृक्षों का द्वीप कहते थे। प्राचीन ईरानी इसे सिन्धु नदी के नाम से जोड़ते थे, जिसे वे हिन्दू न कहकर हिन्दू कहते थे। यहाँ नाम फिर पड़ते पढ़ने में फर्क गया और पूरे देश को इसी एक नदी के नाम से जाना जाने लगा। यूनानी इसे ‘इंडे’ और अरब इसे हिन्द कहते थे। मध्यकाल में इस देश को हिन्दुस्तान कहा जाने लगा। यह शब्द भी फारसी शब्द ‘हिन्द’ से बना है। यूनानी भाषा के ‘इंडे’ के आधार पर अंग्रेज इसे ‘इंडिया’ कहने लगे।


विंध्य की पर्वत-श्रृंखला देश को उत्तर और दक्षिण, दो भागों में बाँटती है। उत्तर में इंडो यूरोपीय परिवार की भाषाएँ बोलने वालों की और दक्षिण में द्रविड़ परिवार की भाषाएँ बोलने वालों का बाहुल्य है।


नोट : भारत की जनसंख्या का निर्माण जिन प्रमुख नस्लों के लोगों के मिश्रण से हुआ है, वे इस प्रकार हैं—प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड, द्रविड़ियन, काकेशियन, नीग्रॉयड और मंगोलॉयड।


भारतीय इतिहास को अध्ययन की सुविधा के लिए तीन भागों में बाँटा गया है—प्राचीन भारत, मध्यकालीन भारत एवं आधुनिक भारत।


नोट : सबसे पहले इतिहास को तीन भागों में बाँटने का श्रेय जर्मन इतिहासकार क्रिस्टोफ सेलरियस (Christoph Cellarius) (1638-1707 AD) को है।


प्राचीन भारत


1. प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत


प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रमाण जो मुख्यतः चार स्रोतों से प्राप्त होते हैं—1. धर्मग्रंथ 2. ऐतिहासिक ग्रंथ 3. विदेशियों का विवरण व 4. पुरातत्व-संबंधी साक्ष्य।


धर्मग्रंथ एवं ऐतिहासिक ग्रंथ से मिलनेवाली महत्वपूर्ण जानकारी


➤ भारत का सर्वप्राचीन धर्मग्रंथ वेद है, जिसके संकलनकर्ता महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को माना जाता है। वेद उपदेश देता है। भारतीय परम्परा वेदों को नित्य तथा अपौरुषेय मानती है। वेद चार हैं—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। इन चार वेदों को संहिता कहा जाता है।


ऋग्वेद


➤ ऋचाओं के क्रमबद्ध ज्ञान के संग्रह को ऋग्वेद कहा जाता है। इसमें 10 मंडल, 1028 सूक्त (वालखिल्य पाठ के 11 सूक्त सहित) एवं 10,462 ऋचाएँ हैं। इस वेद के ऋचाओं को पढ़ने वाले ऋषि को होतृ कहते हैं। इस वेद से आर्यों के राजनीतिक प्रणाली, इतिहास एवं ईश्वर की महिमा के बारे में जानकारी मिलती है।


➤ विश्वामित्र द्वारा रचित ऋग्वेद के तीसरे मंडल में सूर्य देवता गायत्री को समर्पित प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है। इसके 9वें मंडल में देवता सोम का उल्लेख है।


➤ इसके 8वें मंडल की हस्तलिखित ऋचाओं को खिल कहा जाता है।


➤ ऋग्वेद का सबसे बड़ा 10वाँ मंडल है। इसमें नासदीय सूक्त (नदियों की प्रशंसा), पुरुषसूक्त (वैदिक समाजशास्त्र), नासदीय सूक्त (ब्रह्मांड के सृजन से संबंधित विभिन्न अनुमान), सूर्य सूक्त (विवाह सूक्त) आदि सम्मिलित हैं।


➤ यज्ञीय सामग्री का संग्रह तथा आदि स्रोत (ऋग्वेद के 10वें मंडल में वर्णित) पुरुषसूक्त है, जिसके अनुसार चार वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) आदि पुरुष ब्रह्मा के क्रमशः मुख, भुजाओं, जंघाओं और चरणों से उत्पन्न हुए।


नोट : ऋग्वेद चार प्रमुख जातियों की स्थितियों, व्यवस्थाओं, दायित्वों, कर्तव्यों तथा विशेषताओं में स्पष्ट विभेद करता है।


➤ ऋग्वेद के कई परिच्छेदों में प्रयुक्त अभ्र (जिसका वध नहीं किया जाता है) शब्द का संबंध गाय से है।


➤ ऋग्वेद में ब्रह्म का उल्लेख तो है, किन्तु आत्मा का नहीं।


ईसा पूर्व एवं ईसवी


वर्तमान में प्रचलित ग्रेगोरियन कैलेंडर (ईसाई कैलेंडर) ईसाई धर्मग्रंथ ईसाईयों के जन्म-वर्ष (कलित) पर आधारित है। ईसा मसीह के जन्म के पहले के समय को ईसा पूर्व (B.C.-Before the birth of Jesus Christ) कहा जाता है। ईसा पूर्व में वर्षों की गिनती उल्टी दिशा में होती है, जैसे महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में एवं मृत्यु 483 ईसा पूर्व में हुआ था।


ईसा मसीह के जन्म-तिथि से आरंभ हुआ सन, ईसवी सन कहलाता है, इसके लिए संक्षेप में ई. लिखा जाता है। ई. को लैटिन भाषा के शब्द A.D. में लिखा जाता है। A.D. यानी Anno Domini, जिसका शाब्दिक अर्थ है—In the year of lord Jesus Christ।


विन्सेंट आर्थर स्मिथ ने प्राचीन भारत का पहला सुव्यवस्थित इतिहास अर्ली हिस्ट्री ऑफ इंडिया 1904 में तैयार किया। इस पुस्तक के एक-तिहाई भाग में केवल सिकन्दर का आक्रमण वर्णित है। इसमें भारत के स्वदेशी शासन वाला देश बताया गया है, जिसे एशिया में पहली बार कभी राजनीतिक एकता का अनुभव नहीं हुआ था। उन्होंने लिखा है—‘वस्तुतः भारतीय इतिहासकारों का सरोकार शासन के एक मात्र स्वरूप तानाशाही से ही है।’


➤ वामनावतार के तीन पगों के आख्यान का प्राचीनतम स्रोत ऋग्वेद है।


वामन अवतार


वामन अवतार भगवान वामन श्री हरि के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए थे। उनके पिता कश्यप ऋषि एवं माता अदिति थीं। वे दोनों ब्राह्मण के रूप में जन्मे थे। भागवत पुराण के अनुसार वामन अवतार के रूप में भगवान विष्णु द्वारा इन्द्र को पुनः स्वर्गलोक पर अधिकार दिलाना था। वामन भगवान को दक्षिण भारत में उपेन्द्र के नाम से जाना जाता है।


➤ ऋग्वेद में इन्द्र के लिए 250 तथा अग्नि के लिए 200 ऋचाओं की रचना की गई है।


नोट : प्राचीन इतिहास के साधन के रूप में वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान है।


यजुर्वेद


➤ सस्वर पाठ के लिए मंत्रों तथा बलि के समय अनुष्ठान के लिए नियमों का संकलन यजुर्वेद कहलाता है। इसके पाठकर्ता को अध्वर्यु कहते हैं।


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यजुर्वेद


➤ यजुर्वेद में यज्ञों के नियमों एवं विधि-विधानों का संकलन मिलता है।

➤ इसमें बलिदान विधि का भी वर्णन है।

➤ यह एक ऐसा वेद है जो गद्य एवं पद्य दोनों में है।


सामवेद


➤ ‘साम’ का शाब्दिक अर्थ है गान। इस वेद में मुख्यतः यज्ञों के अवसर पर गाये जाने वाले ऋचाओं (मंत्रों) का संकलन है। इसके पाठकर्ता को उद्गाता कहते हैं। इसका संकलन ऋग्वेद पर आधारित है। इसमें 1810 सूक्त हैं जो प्रायः ऋग्वेद से लिए गए हैं।


➤ इसे भारतीय संगीत का जनक कहा जाता है।


नोट : यजुर्वेद तथा सामवेद में किसी भी विशिष्ट ऐतिहासिक घटना का वर्णन नहीं मिलता है।


अथर्ववेद


➤ अथर्वा ऋषि द्वारा रचित इस वेद में कुल 731 मंत्र तथा लगभग 6000 पद्य हैं। इसके कुछ मंत्र ऋग्वैदिक मंत्रों से भी प्राचीनतर हैं। औषधियों का उल्लेख सबसे पहले अथर्ववेद में मिलता है।


➤ ऐतिहासिक दृष्टि से अथर्ववेद का महत्व इस बात में है कि इसमें सामान्य मनुष्यों के विचारों तथा अंधविश्वासों का विवरण मिलता है।


➤ पृथ्वीमुक्त अथर्ववेद का प्रतिनिधि सूक्त माना जाता है। इसमें मानव जीवन के सभी पक्षों—गृह निर्माण, कृषि की उन्नति, व्यापारिक मार्गों का गाहन (खोज), रोग निवारण, समन्वय, विवाह तथा प्रेम, औषधियाँ, राजभक्ति, राजा का चुनाव, बहुत से वनस्पतियों एवं औषधियों, शाप, प्रतिकार, अपशकुन, मातृभक्ति आदि का विवरण दिया गया है। कुछ मंत्रों में जादू-टोने का भी वर्णन है।


➤ अथर्ववेद में परीक्षित को कुरुओं का राजा कहा गया है तथा कुछ ऋचाओं में कुरु समृद्धि का अच्छा चित्रण मिलता है।


➤ इसमें सभा एवं समिति को प्रजापति की दो पुत्रियाँ कहा गया है।


➤ वेदों की भी कई शाखाएँ हैं जो वैदिक अध्ययन और व्याख्या से जुड़े विभिन्न दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। शाकल शाखा ऋग्वेद से जुड़ी एकमात्र जीवित शाखा है। यजुर्वेद को शुक्ल यजुर्वेद और कृष्ण यजुर्वेद की शाखाओं में बाँटा गया है। माध्यन्दिन और काण्व शुक्ल यजुर्वेद अथवा वाजसनेय संहिता की शाखाएँ हैं। कृष्ण यजुर्वेद से जुड़ी शाखाएँ—काठक, कपिष्ठल मैत्रायणी और तैत्तिरीय हैं। सामवेद की शाखाएँ—कौथुम, राणायनीय एवं जैमिनीय या जैनायनीय और जैमिनीय हैं। अथर्व वेद की शाखाएँ शौनिक और पैप्पलाद हैं।


नोट : सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद एवं सबसे बाद का वेद अथर्ववेद है।


ब्राह्मण, आरण्यक तथा उपनिषद


➤ वेदों के पश्चात् ब्राह्मणों, आरण्यकों तथा उपनिषदों का स्थान है। इनसे उत्तर वैदिक कालीन समाज एवं संस्कृति के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।


➤ ब्राह्मण ग्रंथ वैदिक संहिताओं की व्याख्या करने के लिए लिखे गए हैं। प्रत्येक संहिता के लिए अलग-अलग ब्राह्मण ग्रंथ हैं जिनमें सारांश में दिया गया है।


वेद ब्राह्मण ग्रंथ


ऋग्वेद ऐतरेय एवं कौषीतकी

यजुर्वेद तैत्तिरीय व शतपथ

सामवेद पंचविंश

अथर्ववेद गोपथ



➤ इन ब्राह्मण ग्रंथों से हमें प्रारंभिक वैदिक काल के बाद और विचार के पूर्व की घटनाओं का ज्ञान प्राप्त होता है।


➤ ऐतरेय में राज्याभिषेक के नियम एवं कुछ प्राचीन राजाओं के नाम दिए गए हैं।


➤ शतपथ में गांधार, शल्य, कैकेय, कुरु, पांचाल, कोसल, विदेह आदि राज्यों का उल्लेख मिलता है।


➤ वैदिक साहित्य में ऋग्वेद के बाद शतपथ ब्राह्मण का स्थान है।


➤ आरण्यक में यज्ञ से जुड़े कर्मकांडों की दार्शनिक और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।


➤ उपनिषदों की संख्या 108 है, जिनमें 13 को महत्वपूर्ण उपनिषदों की श्रेणी में रखा गया है। इसमें यज्ञ से जुड़े दार्शनिक विचार, शरीर, ब्रह्माण्ड, आत्मा तथा ब्रह्म की व्याख्या की गई है।


➤ स्त्री की सर्वाधिक फूहड़ दृष्टि निंदनीय संहिताओं से प्राप्त होती है जिसमें जुआ और शराव की भाँति स्त्री को पुरुष का तीसरा मुख्य दोष बताया गया है।


➤ शतपथ ब्राह्मण में स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया है।


➤ गार्गीपाठ्य में चारों आप्याओं का उल्लेख मिलता है।


➤ स्मृतिग्रंथों में सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक मनुस्मृति मानी जाती है। यह शुंग काल का मानक ग्रंथ है। नारद स्मृति गुप्त युग के विषय में जानकारी प्रदान करता है।


वेदांग एवं सूत्र


➤ वेदों को भली-भाँति समझने के लिए छह वेदांगों की रचना हुई। ये हैं—शिक्षा (शुद्ध उच्चारण शास्त्र), कल्प (कर्मकाण्डीय विधि), निरुक्त (शब्दों की व्युत्पत्ति का शास्त्र), व्याकरण, छन्द व ज्योतिष।


➤ वैदिक साहित्य को अच्छी तरह रखने के लिए सूत्र साहित्य का प्रयोजन किया गया है। भौग एवं तद्य एवं धर्मसूत्रों के अध्ययन से हमें यज्ञीय विधि-विधानों, कर्मकाण्डों तथा राजनीति, विधि एवं व्यवहार से संबंधित महत्वपूर्ण बातें ज्ञात करते हैं।


➤ प्रमुख सूत्रकारों में गौतम बौधायन, आपस्तम्ब, वशिष्ठ आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।


➤ सूत्रों में गौतम धर्मसूत्र सबसे प्राचीन माना गया है।


पुराण


➤ भारतीय ऐतिहासिक कथाओं का सबसे अच्छा क्रमबद्ध विवरण पुराणों में मिलता है। इसके रचयिता लोमर्हर्ष अथवा इनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं। इनकी संख्या 18 है, जिनमें केवल पाँच—मत्स्य, वायु, विष्णु, ब्राह्मण एवं भागवत में ही राजाओं की वंशावली पायी जाती है।


पुराण संबंधित वंश


विष्णु पुराण मौर्य वंश

मत्स्य पुराण आन्ध्र सातवाहन

वायु पुराण गुप्त वंश



नोट : पुराणों में मत्स्यपुराण सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक है।


➤ अधिकतर पुराण सरल संस्कृत श्लोकों में लिखे गये हैं। स्त्रियों तथा शूद्र जिन्हें वेद पढ़ने की अनुमति नहीं थी, वे भी पुराण सुन सकते थे। पुराणों का पाठ पुजारी मंदिरों में किया करते थे।


➤ सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अग्निपुराण का काफी महत्व है जिसमें राजतन्त्र के साथ-साथ कृषि संबंधी विवरण भी दिया गया है।


नोट : उपनिषदों की रचना पुराणों से पहले हुई थी।


बौद्ध, जैन एवं अन्य साहित्य


➤ जातक में बुद्ध की पूर्वजन्म की कहानी वर्णित है। हीनयान का प्रमुख ग्रंथ कथावस्तु है, जिसमें महात्मा बुद्ध का जीवन-चरित अनेक कथानकों के साथ वर्णित है।


➤ जैन साहित्य को आगम कहा जाता है। जैनधर्म का प्रारंभिक इतिहास कल्पसूत्र से ज्ञात होता है। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में महावीर के जीवन-वृत्तान्त तथा अन्य समकालीनों के साथ उनके संबंधों का विवरण मिलता है।


➤ अर्थशास्त्र के लेखक चाणक्य (कौटिल्य या विष्णुगुप्त) हैं। यह 15 अधिकरणों एवं 180 प्रकरणों में विभाजित है। इससे मौर्यकालीन इतिहास की जानकारी प्राप्त होती है।


➤ संस्कृत साहित्य में ऐतिहासिक घटनाओं को क्रमबद्ध लिखने का सर्वप्रथम प्रयास कल्हण के द्वारा किया गया। कल्हण द्वारा रचित पुस्तक राजतरंगिणी (राजाओं की नदी) है। इसमें आठ सर्ग हैं, जिन्हें तरंगों की संज्ञा दी गई है। इसमें प्रारंभ से लेकर 12वीं सदी तक के कश्मीर के शासकों का वर्णन है।


➤ अरबों की सिंध-विजय का वृत्तांत चचनामा (लेखक—अली अहमद) में सुरक्षित है।


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➤ ‘अष्टाध्यायी’ (संस्कृत भाषा व्याकरण की प्रथम पुस्तक) के लेखक पाणिनि हैं। इससे मौर्य के पहले का इतिहास तथा मौर्ययुगीन राजनीतिक व अर्थव्यवस्था की जानकारी प्राप्त होती है।


नोट : अष्टाध्यायी में पहली बार लिपि शब्द का प्रयोग हुआ है।


➤ कात्यायन की वार्तिक-संहिता एक ज्योतिष ग्रंथ है, फिर भी इसमें भारत पर होने वाले यवन आक्रमण का उल्लेख मिलता है।


➤ पतंजलि द्वारा रचित महाभाष्य से शुंगों के इतिहास का पता चलता है।


विदेशी यात्रियों से मिलनेवाली प्रमुख जानकारी


A. यूनानी-रोमन लेखक


1. टेसियस : यह ईरान का राजवैद्य था। भारत के संबंध में इसका विवरण अविश्वसनीय होने के कारण ऐतिहासिक रूप से पूर्ण होने के कारण अविश्वसनीय है।


2. हेरोडोटस : इसे ‘इतिहास का पिता’ कहा जाता है। इसने अपनी पुस्तक हिस्टोरिका में 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के भारत-फारस (ईरान) के संबंध का वर्णन किया है। परन्तु इसका विवरण भी अनुश्रुतियों एवं अफवाहों पर आधारित है।


3. सिकन्दर के साथ आनेवाले लेखकों में नियार्कस, आनेसिक्रेटस तथा अरिस्टोबुलस के विवरण अधिक प्रामाणिक एवं विश्वसनीय हैं।


4. मेगस्थनीज : यह सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चन्द्रगुप्त मौर्य के राजदरबार में आया था। इसने अपनी पुस्तक इंडिका में मौर्ययुगीन समाज एवं संस्कृति के विषय में जानकारी दी।


5. डायमेकस : यह सीरियन नरेश एण्टियोकस का राजदूत था, जो बिन्दुसार के राजदरबार में आया था। इसका विवरण भी मौर्य-युग से संबंधित है।


6. ड्योनिसियस : यह मिस्र नरेश टॉलमी फिलाडेल्फस का राजदूत था, जो अशोक के राजदरबार में आया था।


7. टॉलमी : इसने दूसरी शताब्दी में ‘भारत का भूगोल’ नामक पुस्तक लिखी।


8. प्लिनी : इसने प्रथम शताब्दी में ‘नेचुरल हिस्ट्री’ नामक पुस्तक लिखी। इसमें भारतीय पशुओं, पेड़-पौधों, खनिज-पदार्थों आदि के बारे में विवरण मिलता है।


9. पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन-सी : इस पुस्तक के लेखक के बारे में जानकारी नहीं है। यह लेखक करीब 80 ई. में महासागर की यात्रा पर आया था। इसने इस समय के भारत के बन्दरगाहों तथा व्यापारिक वस्तुओं के बारे में जानकारी दी है।


B. चीनी लेखक


1. फाहियान : यह चीनी यात्री गुप्त नरेश चन्द्रगुप्त द्वितीय के दरबार में आया था। इसने अपने विवरण में मध्यप्रदेश के समाज एवं संस्कृति के बारे में वर्णन किया है। इसने मध्यप्रदेश की जनता को सुखी एवं समृद्ध बताया है। यह 14 वर्षों तक भारत में रहा।


2. सुयंग : यह 518 ई. में भारत आया। इसने अपने तीन वर्षों की यात्रा में बौद्ध धर्म की प्राप्तियाँ एकत्रित कीं।


3. ह्वेनसांग : यह हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया था। ह्वेनसांग 629 ई. में चीन से भारतवर्ष के लिए प्रस्थान किया और एक वर्ष की यात्रा के बाद सर्वप्रथम यह प्रयाग तथा कनौज पहुँचा। भारत में 15 वर्षों तक ठहरकर 645 ई. में चीन लौट गया। वह बिहार में नालंदा जिला स्थित नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन करने तथा साथ ही बौद्ध धर्म की खोज करने के जाने के लिए आया था। इसका भ्रमण वृत्तांत सी-यू-की नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें 138 देशों का विवरण मिलता है। इसने हर्षकालीन समाज, धर्म तथा राजनीति के बारे में वर्णन किया है। इसके अनुसार भारत में चार राजपूत थे। ह्वेनसांग ने बुद्ध की प्रतिमा के साथ-साथ सूर्य और शिव की प्रतिमाओं की भी पूजा किया था।


नोट : ह्वेनसांग के अध्ययन के समय नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य शीलभद्र थे। यह विश्वविद्यालय बौद्ध दर्शन के लिए प्रसिद्ध था।


4. इत्सिंग : यह 7वीं शताब्दी के अन्त में भारत आया। इसने अपने विवरण में नालंदा विश्वविद्यालय, विक्रमशिला विश्वविद्यालय तथा अपने समय के भारत का वर्णन किया है।


C. अरबी लेखक


1. अलबरूनी : यह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। अलबरूनी ख्वारिज्म या खीवा (आधुनिक तुर्कमेनिस्तान) का रहने वाला था। अरबी में लिखी गई उसकी कृति किताब-उल-हिन्द या तहकीक-उल-हिन्द (भारत की खोज), आज भी भारतीय इतिहासकारों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत है। यह एक विस्तृत ग्रंथ है जो धर्म और दर्शन, त्योहारों, खगोल विज्ञान, कीमिया, शक्ति-रिवाजों तथा प्रथाओं, सामाजिक जीवन, भार-तौल तथा मापन विधियों, मतभेदों, सम्पदा विज्ञान आदि विषयों के आधार पर 80 अध्यायों में विभाजित है। इसमें राजपूतकालीन समाज, धर्म, रीति-रिवाज, राजनीति आदि पर सुन्दर प्रकाश डाला गया है।


2. इब्न बतूता : इसके द्वारा अरबी भाषा में लिखा गया उसका यात्रा-वृत्तांत जिसे रहता कहा जाता है, 14वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के विषय में बहुत ही प्रचुर तथा सबसे रोचक जानकारियाँ देता है। 1333 ई. में दिल्ली पहुँचने पर इसकी विद्वता से प्रभावित होकर सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने उसे दिल्ली का काजी या न्यायाधीश नियुक्त किया।


D. अन्य लेखक


1. तारानाथ : यह एक तिब्बती लेखक था। इसने ‘कंग्यूर’ तथा ‘तंग्यूर’ नामक ग्रंथ की रचना की। इनसे भारतीय इतिहास के बारे में जानकारी मिलती है।


2. मार्कोपोलो : यह 13वीं शताब्दी के अन्त में पाण्ड्य देश की यात्रा पर आया था। इसका विवरण पाण्ड्य इतिहास के अध्ययन के लिए उपयोगी है।


पुरातत्व संबंधी साक्ष्य से मिलनेवाली जानकारी


➤ भारतीय पुरातत्वशास्त्र का पितामह (Father of Indian Archeology) सर अलेक्जेंडर कनिंघम को कहा जाता है।


➤ अलेक्जेंडर री, ए.एच. लॉंगहर्स्ट, रावर्ट सेवेल, जेम्स वर्गस, वाल्टर इलियट व सभी भारत के पुरातात्विक स्थलों के उत्खनन से संबंधित हैं। इन लोगों ने भेड़ाघाट, एरणसिंला, अमरावती आदि स्थलों की खुदाई की।


➤ 1400 ई.पू. के अभिलेख ‘बोगाज-कोई’ (एशिया माइनर) से वैदिक देवता मित्र, वरुण, इन्द्र और नासत्य (अश्विनीकुमार) के नाम मिलते हैं।


➤ मध्य भारत में भागवत धर्म (वैष्णव सम्प्रदाय) विकसित होने के प्रमाण यवन राजदूत हेलियोडोरस के बेसनगर (विदिशा) गरुड़ स्तम्भ लेख से प्राप्त होता है।


➤ सर्वप्रथम ‘भारतवर्ष’ का जिक्र हाथीगुम्फा अभिलेख में है।


➤ सर्वप्रथम दुर्भिक्ष की जानकारी देवनागरी अभिलेख सोहगौरा अभिलेख है। इस अभिलेख में संकट काल में उपयोग हेतु खाद्यान्न सुरक्षित रखने का भी उल्लेख है।


➤ सर्वप्रथम भारत पर होनेवाले हुए आक्रमण की जानकारी भीतरी स्तम्भ लेख से प्राप्त होती है।


➤ सती-प्रथा का पहला लिखित साक्ष्य एरण अभिलेख (शासक भानुगुप्त) से प्राप्त होती है।


➤ सातवाहन राजाओं का पूरा इतिहास उनके अभिलेखों के आधार पर लिखा गया है।


➤ रेशम बुनकर की श्रेणियों की जानकारी मंदसौर अभिलेख से प्राप्त होती है।


➤ कश्मीर मण्डलाधिपति पुरुस्थल के मृगस्थान (यज्ञ घर) का साक्ष्य मिला है। इसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं। यहाँ मनुष्य के साथ उसके पालतू कुत्ते को भी दफनाने की प्रथा प्रचलित थी।


नोट : ‘पुरास्थल’ उस स्थान को कहते हैं जहाँ औजार, बर्तन और इमारतों जैसी वस्तुओं के अवशेष मिलते हैं।


**4** | **लुसेंट सामान्य ज्ञान**

➤ प्राचीनतम सिक्कों को आहत सिक्के कहा जाता है, इसी को साहित्य में काषार्पण कहा गया है।

➤ सर्वप्रथम सिक्कों पर लेख लिखने का कार्य यवन शासकों ने किया।

### **महत्वपूर्ण अभिलेख**



***नोट : अभिलेखों का अध्ययन एपीग्राफी कहलाता है।***

➤ समुद्रगुप्त की वीणा बजाती हुई मुद्रा वाले सिक्के से उसके संगीत-प्रेमी होने का प्रमाण मिलता है।

➤ अरिकमेडू (पुदुचेरी के निकट) से रोमन सिक्के प्राप्त हुए हैं।

***नोट : सबसे पहले भारत के संबंध बर्मा (सुवर्णभूमि - वर्तमान में म्यांमार), मलाया (स्वर्णद्वीप), कंबोडिया (कंबोज) और जावा (यवद्वीप) से स्थापित हुए।***

### **2. प्रागैतिहासिक काल**

➤ इतिहास का विभाजन **प्रागैतिहासिक** या **प्राक इतिहास** (*Prehistory*), **आद्य इतिहास** (*Protohistory*) व **इतिहास** (*History*) तीन भागों में किया गया है।

➤ जिस काल में मनुष्य ने घटनाओं का कोई लिखित विवरण उद्धृत नहीं किया, उसे **'प्रागैतिहासिक काल'** कहते हैं।

➤ **'आद्य ऐतिहासिक काल'** उस काल को कहते हैं, जिस काल में लेखन-कला के प्रचलन के बाद उपलब्ध लेख पढ़े नहीं जा सके हैं।

➤ मानव विकास के उस काल को **इतिहास** कहा जाता है, जिसका विवरण लिखित रूप में उपलब्ध है।



***नोट : 'ज्ञानी मानव' (होमोसैपियंस) का प्रवेश इस धरती पर आज से लगभग तीस या चालीस हजार वर्ष पूर्व हुआ।***

#### **नाम एवं तिथियाँ**

➤ **पुरापाषाण काल :** यह 20 लाख वर्ष पहले से 12 हजार वर्ष पहले के काल को कहा जाता है। इस काल को तीन भागों में विभाजित किया गया है : आरंभिक, मध्य एवं उत्तर पुरापाषाण काल। मानव इतिहास की लगभग 99% कहानी इसी काल के दौरान हुई।

➤ **मध्यपाषाण काल :** जिस काल में पर्यावरणीय बदलाव मिलते हैं, उसे मध्यपाषाण काल कहते हैं। इसका काल लगभग 12 हजार वर्ष पहले से लेकर 10 हजार वर्ष पहले तक माना जाता है। इस काल के पाषण औजार आमतौर पर बहुत छोटे होते थे। इन्हें माइक्रोलिथ यानी लघुपाषाण कहा जाता है। प्रायः इन औजारों में हड्डियों या लकड़ियों के मुट्ठे लगे हँसिया और आरी जैसे औजार मिलते हैं।

➤ **नवपाषाण काल :** इसकी शुरुआत लगभग 10 हजार वर्ष पहले से होती है।

➤ **'पूर्व-पाषाण युग'** या पुरा-पाषाणकाल के मानव की जीविका का मुख्य आधार शिकार था—शिकार पुरा-पाषाणकाल में आदि मानव के मनोरंजन के भी साधन थे।

➤ आग का आविष्कार पुरा-पाषाणकाल में व पहिये का नव-पाषाणकाल में हुआ। पुरापाषाणिक पुरास्थल कुरनूल गुफा में राख के अवशेष मिले हैं।

> ### **कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ**

> ★ मध्यपाषाण काल 12-10 हजार वर्ष पहले

> ★ बसने की प्रक्रिया का आरंभ 12 हजार वर्ष पहले

> ★ नवपाषाण काल का आरंभ 10 हजार वर्ष पहले

> ★ मेहरगढ़ में बस्ती का आरंभ लगभग 8 हजार वर्ष पहले

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➤ मनुष्य में स्थायी निवास की प्रवृत्ति नव-पाषाणकाल में हुई तथा उसने सबसे पहले कुत्ता को पालतू बनाया।

➤ मनुष्य ने सर्वप्रथम ताँबा धातु का प्रयोग किया तथा उसके द्वारा बनाया जानेवाला प्रथम औजार कुल्हाड़ी (प्राप्ति स्थल—अतिरम्पक्कम) था।

➤ कृषि का आविष्कार लगभग 8 हजार वर्ष पूर्व नव-पाषाणकाल में हुआ। प्रागैतिहासिक अन्न उत्पादक स्थल मेहरगढ़ पश्चिमी बलूचिस्तान में बोलन नदी के किनारे अवस्थित है। कृषि के लिए अपनाई गई सबसे प्राचीन फसल गेहूं (पहली फसल) एवं जौ थी लेकिन मानव द्वारा सर्वप्रथम प्रयुक्त अनाज चावल था।

➤ कृषि का प्रथम उदाहरण मेहरगढ़ से प्राप्त हुआ है। कोल्दिहवा (उत्तर प्रदेश) का संबंध चावल के प्राचीनतम साक्ष्य से है।

➤ मेहरगढ़ में एक कब्र में मृतक के साथ एक बकरी को भी दफनाया गया है।

➤ भारत में पूर्व प्रस्तर युग के अधिकांश औजार स्फटिक (पत्थर) के बने थे। रॉबर्ट ब्रुस फुट पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1863 में भारत में पुरापाषाणकालीन औजारों की खोज की। पल्लावरम् नामक स्थान पर प्रथम भारतीय पुरापाषाण कलाकृति की खोज हुई थी।

➤ भारत में मध्य पाषाणकाल के विषय में जानकारी सर्वप्रथम 1867 ई. में हुई जब सी. एल. कार्लाइल ने विंध्यक्षेत्र में लघु पाषाणोपकरण (*Microliths*) खोज निकाले। भारत में मानव अस्थिपंजर, मध्य पाषाणकाल से ही सर्वप्रथम प्राप्त होने लगता है।

➤ भारत में नवपाषाणकालीन सभ्यता का प्रारंभ ईसा पूर्व चार हजार के लगभग हुआ।

➤ भारत का सबसे प्राचीन नगर मोहनजोदड़ो था, सिंधी भाषा में जिसका अर्थ है मृतकों का टीला।

➤ असम का श्वेतभ्रू गिबन भारत में पाया जाने वाला एक मात्र मानवाभ कपि है।

➤ इनामगाँव ताम्रपाषाण युग की एक बड़ी बस्ती थी। इसका संबंध जोर्वे संस्कृति से है।

➤ भारत में शिवालक की पहाड़ी से जीवाश्म का प्रमाण मिला है।

➤ वर्ष 1867-68 में पहली बार भारत में शैल-चित्रों की खोज आर्कीबोल्ड कार्लाइल ने की थी।

➤ भीमबेटका (भीमबैठका) गुफा पुरापाषाणिक आवासीय पुरास्थल है। यह आदि मानव द्वारा बनाए गए शैलचित्रों और शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है। इन चित्रों को पुरापाषण काल से मध्य पाषण काल के समय का माना जाता है। ये चित्र भारतीय उपमहाद्वीप में मानव जीवन के प्राचीनतम चिह्न हैं। यह म.प्र. के रायसेन जिले में स्थित है। इसकी खोज वर्ष 1957-58 में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा की गई थी। भीमबेटका क्षेत्र को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भोपाल मंडल ने अगस्त 1990 में राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया। इसके बाद जुलाई 2003 में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।

➤ भारत में मनुष्य संबंधी सबसे पहला प्रमाण नर्मदा घाटी में मिला है।

***नोट : भारतीय नागरिक सेवा के अधिकारी रिजले प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने प्रथम बार वैज्ञा

निक आधार पर भारत की जनसंख्या का प्रजातीय विभेदीकरण किया।***


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