भारत के यवन राज्य 4

# 17. भारत के यवन राज्य


➤ भारत पर आक्रमण करनेवाले विदेशी आक्रमणकारियों का क्रम है—हिन्द-यूनानी \rightarrow शक \rightarrow पह्लव \rightarrow कुषाण।


➤ सेल्युकस के द्वारा स्थापित पश्चिमी तथा मध्य एशिया के विशाल साम्राज्य को इसके उत्तराधिकारी एण्टिओकस प्रथम ने अक्षुण्ण बनाए रखा। एण्टिओकस-II के शासनकाल में विद्रोह के फलस्वरूप उसके अनेक प्रांत स्वतंत्र हो गए।


➤ बैक्ट्रिया के विद्रोह का नेतृत्व डियोडोटस प्रथम ने किया था। बैक्ट्रिया पर डियोडोटस प्रथम के साथ इन राजाओं ने क्रमशः शासन किया—डियोडोटस-II, यूथिडेमस, डेमिट्रियस, मिनांडर, युक्रेटाइड्स, एण्टी आलकीडस तथा हर्मियस।


➤ भारत पर सबसे पहले आक्रमण बैक्ट्रिया के शासक डेमिट्रियस ने किया। इसने 190 ईसा पूर्व में भारत पर आक्रमण कर अफगानिस्तान, पंजाब एवं सिंध के बहुत बड़े भाग पर अधिकार कर लिया। इसने शाकल को अपनी राजधानी बनायी। इसे ही हिन्द-यूनानी या बैक्ट्रियाई यूनानी कहा गया।


➤ हिन्द-यूनानी शासकों में सबसे अधिक विख्यात मिनांडर (165-145 ईसा पूर्व) हुआ। इसकी राजधानी शाकल (आधुनिक सियालकोट) शिक्षा का प्रमुख केन्द्र था।


➤ मिनांडर ने नागसेन (नागार्जुन) से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली।


➤ मिनांडर के प्रश्न एवं नागसेन द्वारा दिए गए उत्तर एक पुस्तक के रूप में संगृहीत हैं, जिसका नाम 'मिलिन्दपन्हो' अर्था


त् मिलिंद के प्रश्न या 'मिलिन्दप्रश्न' है।




➤ हिन्द-यूनानी भारत के पहले शासक हुए जिनके जारी किये सिक्कों के बारे में निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सिक्के किन-किन राजाओं के हैं।


➤ भारत में सबसे पहले हिन्द-यूनानियों ने ही सोने के सिक्के जारी किये।


➤ हिन्द-यूनानी शासकों ने भारत के पश्चिमोत्तर सीमा-प्रांत में यूनान की प्राचीन कला चलाई, जिसे हेलेनिस्टिक आर्ट कहते हैं। भारत में गंधार कला इसका उत्तम उदाहरण है।


**नोट:** *यूनानियों ने परदे का प्रचलन आरंभ कर भारतीय नाट्यकला के विकास में योगदान किया। चूंकि परदा यूनानियों की देन था इसलिए वह यवनिका के नाम से प्रसिद्ध हुआ।*


### 18. शक


➤ यूनानियों के बाद शक आए। शकों की पाँच शाखाएँ थीं और हर शाखा की राजधानी भारत और अफगानिस्तान में अलग-अलग भागों में थी।


➤ पहली शाखा ने अफगानिस्तान, दूसरी शाखा ने पंजाब (राजधानी—तक्षशिला), तीसरी शाखा ने मथुरा, चौथी शाखा ने पश्चिमी भारत एवं पाँचवीं शाखा ने ऊपरी दक्कन पर प्रभुत्व स्थापित किया। प्रथम शक राजा मोअ था। शक मूलतः मध्य एशिया के निवासी थे और चारागाह की खोज में भारत आए।


➤ 58 ईसा पूर्व में उज्जैन के एक स्थानीय राजा ने शकों को पराजित करके बाहर खदेड़ दिया और विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।


➤ शकों पर विजय के उपलक्ष्य में 58 ईसा पूर्व से एक नया संवत् विक्रम संवत् के नाम से प्रारंभ हुआ। उसी समय से 'विक्रमादित्य' एक लोकप्रिय उपाधि बन गयी, जिसकी संख्या भारतीय इतिहास में 14 तक पहुँच गयी। गुप्त सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय सबसे अधिक विख्यात विक्रमादित्य था।


➤ शकों की अन्य शाखाओं की तुलना में पश्चिम भारत में प्रभुत्व स्थापित करनेवाली शाखा ने सबसे लम्बे अरसे तक शासन किया।


➤ गुजरात में चल रहे समुद्री व्यापार से यह शाखा काफी लाभान्वित हुई और भारी संख्या में चाँदी के सिक्के जारी किए।


➤ शकों का सबसे प्रतापी शासक रुद्रदामन प्रथम था, जिसका शासन (130-150 ई.) गुजरात के बड़े भाग पर था। इसने काठियावाड़ की अर्धशुष्क सुदर्शन झील (मौर्यों द्वारा निर्मित) का जीर्णोद्धार किया।


➤ रुद्रदामन संस्कृत का बड़ा प्रेमी था। उसने ही सबसे पहले विशुद्ध संस्कृत भाषा में लम्बा अभिलेख (गिरनार अभिलेख) जारी किया, इसके पहले के सभी अभिलेख प्राकृत भाषा में रचित थे।


➤ भारत में शक राजा अपने को क्षत्रप कहते थे।


### पार्थियाई या पह्लव


➤ पश्चिमोत्तर भारत में शकों के आधिपत्य के बाद पार्थियाई लोगों का आधिपत्य हुआ। सबसे प्रसिद्ध पार्थियाई राजा गोंडोफर्निस था। इसी के शासन काल में सेंट थामस ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए भारत आया था।


**नोट:** *पार्थियाई लोगों का मूल स्थान ईरान में था।*


### 19. कुषाण


➤ पह्लव के बाद कुषाण आए, जो यूची एवं तोखरी भी कहलाते हैं।


➤ यूची नामक एक कबीला पाँच कुलों में बँट गया था, उन्हीं में एक कुल के थे कुषाण। कुषाण वंश के संस्थापक कुजुल कडफिसेस था। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा कनिष्क था। इनकी राजधानी पुरुषपुर या पेशावर थी। कुषाणों की द्वितीय राजधानी मथुरा थी।


➤ कनिष्क ने 78 ई. (गद्दी पर बैठने के समय) में एक संवत् चलाया, जो शक-संवत् कहलाता है जिसे भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।


➤ बौद्ध धर्म की चौथी बौद्ध-संगीति कनिष्क के शासनकाल में कुण्डलवन (कश्मीर) में प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान वसुमित्र की अध्यक्षता में हुई। कनिष्क बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का अनुयायी था।


**नोट:** *चीनी जनरल पेन चीआ ने कनिष्क को हराया था!*


➤ आरम्भिक कुषाण शासकों ने भारी संख्या में स्वर्ण मुद्राएँ जारी कीं, जिनकी शुद्धता गुप्त काल की स्वर्ण मुद्राओं से उत्कृष्ट है।


**नोट:** *कुषाणों ने सोने के सर्वाधिक शुद्ध सिक्के जारी किए।*


➤ कुषाणों ने उत्तरी तथा उत्तरी पश्चिमी भारत में सर्वाधिक संख्या में ताँबे के सिक्कों को जारी किया था।


➤ कनिष्क का राजवैद्य चरक आयुर्वेद का विख्यात विद्वान था जिसने संस्कृत में चरक संहिता की रचना की जिसमें आठ भाग एवं 120 अध्याय है। यह भारतीय चिकित्सा शास्त्र का विश्व कोश कहलाता है।


➤ महाविभाष सूत्र के रचनाकार वसुमित्र हैं। इसे ही बौद्ध धर्म का विश्वकोश कहा जाता है। कनिष्क के राजकवि अश्वघोष ने बौद्धों का रामायण 'बुद्धचरित' की रचना की।


➤ वसुमित्र, पार्श्व, नागार्जुन, महाचेत और संघरक्ष भी कनिष्क के दरबार की विभूति थे।


➤ भारत का आइन्सटीन नागार्जुन को कहा जाता है। इनकी पुस्तक माध्यमिक सूत्र (इसमें नागार्जुन ने सापेक्षता का सिद्धान्त दिया) है।


➤ कनिष्क की मृत्यु 102 ई. में हो गयी। कुषाण वंश का अंतिम शासक वासुदेव था।


**नोट:** *कुषाण राजा देवपुत्र कहलाते थे। यह उपाधि कुषाणों ने चीनियों से ली।*


➤ गांधार शैली एवं मथुरा शैली का विकास कनिष्क के शासनकाल में हुआ था। मथुरा संग्रहालय में कुषाणकालीन मूर्तियों का संग्रह अधिक मात्रा में है। गंधार कला के लिए तक्षशिला प्रसिद्ध है।


➤ रेशम मार्ग पर नियंत्रण रखने वाले शासकों में सबसे प्रसिद्ध कुषाण थे। कुषाण साम्राज्य में मार्गों पर सुरक्षा का प्रबंध था। रेशम मार्ग का आरंभ कनिष्क ने कराया था।


**नोट:**


 1. *रेशम बनाने की तकनीक का आविष्कार सबसे पहले चीन में हुआ था।*


 2. *मथुरा शाटक नामक विशेष प्रकार के वस्त्र का निर्माण केंद्र था।*


   ➤ कुषाण काल में सबसे अधिक विकास वास्तुकला के क्षेत्र में हुआ था। इसी काल में बुद्ध की खड़ी प्रतिमा का निर्माण हुआ।


### 20. संगम युग


➤ ऐतिहासिक युग के प्रारंभ में दक्षिण भारत का क्रमबद्ध इतिहास हमें जिस साहित्य से ज्ञात होता है उसे संगम साहित्य कहा जाता है। संगम शब्द का अर्थ परिषद् अथवा गोष्ठी होता है जिनमें तमिल कवि एवं विद्वान एकत्र होते थे। प्रत्येक कवि अथवा लेखक अपनी रचनाओं को संगम के समक्ष प्रस्तुत करता था तथा इसकी स्वीकृति प्राप्त हो जाने के बाद ही किसी भी रचना का प्रकाशन संभव था।


➤ परम्परा के अनुसार अति प्राचीन समय में पाण्ड्य राजाओं के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किए गए। इनमें संकलित साहित्य को ही संगम साहित्य की संज्ञा प्रदान की गयी।


**नोट:** *संगम साहित्य का संग्रह लगभग 300 ईसापूर्व से 300 ई. तक तमिलों द्वारा विविध सामाजिक पृष्ठभूमि में किया गया था।*


➤ उपलब्ध संगम साहित्य का विभाजन तीन भागों में किया जाता है— 1. पत्थुपात्तु 2. इथुथोकै तथा 3. पादिनेन कीलकणक्कू।


➤ तिरुवल्लुवर कृत कुरल तमिल साहित्य का एक आधारभूत ग्रंथ बताया जाता है। इसके विषय त्रिवर्ग आचारशास्त्र, रा


जनीति, आर्थिक जीवन एवं प्रणय से संबंधित हैं।




➤ तमिल किंवदन्तियों के अनुसार प्राचीन दक्षिण भारत में तीन संगमों का आयोजन किया गया था, जिसे मुच्चंगम कहा जाता था। तीन संगम ये थे—प्रमुख संगम (प्रथम संगम), मध्य संगम (दूसरा संगम) एवं अंतिम संगम (तीसरा संगम)। इतिहासकार तीसरे संगमकाल को ही संगमकाल मानते हैं और पहले दो संगमों को पौराणिक मानते हैं।







**नोट:** *कवियों और विद्वानों की परिषद् के लिए संगम नाम का प्रयोग सर्वप्रथम सातवीं शती के प्रारंभ में शैव सन्त (नायनार) तिरुनावुक्क रशु (अप्पार) ने किया।*


#### संगम काल के बारे में विवरण देने वाले अन्य स्रोत :


 1. अशोक के अभिलेखों में चोल, पाण्ड्य एवं चेर के बारे में बताया गया है।


 2. मेगस्थनीज, स्ट्रैबो, प्लिनी एवं टॉलेमी जैसे यूनानी लेखकों ने पश्चिम एवं दक्षिण भारत के बीच वाणिज्यिक व्यापार संपर्कों के बारे में उल्लेख किया है।


 3. कलिंग के खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख में तमिल राज्यों का उल्लेख है।


 4. 8वीं सदी ई. में ईरयानार अगप्पोरुल के भाष्य की भूमिका में तीनों संगमों का वर्णन किया गया है।


➤ इलांगो कृत *शिल्प्पादिकारम्* (पायलों का गीत) एक उत्कृष्ट रचना है जो तमिल जनता में राष्ट्रीय काव्य के रूप में मानी जाती है। इसमें 30 सर्ग हैं जिन्हें तीन खण्डों में लिपिबद्ध किया गया है। यह बौद्ध रुझान वाला महाकाव्य है। इसमें कावेरीपट्टनम के कोवलन, उसकी पत्नी कण्णगि एवं नर्तकी माधवी की प्रेम कहानी है।


➤ मदुरा के बौद्ध धर्मावलंबी व्यापारी सीत्तलैसत्तनार ने *मणिमेकलै* की रचना की। इसमें 30 सर्गों के अतिरिक्त एक प्रस्तावना भी है। इसमें जैन प्रभाव है। इसमें राजकुमार उदयकुमारन एवं मणिमेकलै (कोवलन एवं नर्तकी माधवी की पुत्री) की प्रेम कहानी है। इस ग्रंथ की कहानी दार्शनिक एवं शास्त्रार्थ संबंधी वार्ताओं के लिए बनाई गई है। इसका महत्व मुख्यतः धार्मिक है। नीलकंठ शास्त्री के अनुसार यह बौद्ध लेखक दिङ्नाग (5वीं शती) की कृति 'न्याय प्रवेश' पर आधारित है।


➤ *जीवकचिन्तामणि* संगमकाल के बहुत बाद की रचना है। इसकी रचना का श्रेय जैन भिक्षु तिरुतक्क देवर को दिया जाता है। कहा जाता है कि तिरुतक्क देवर पहले चोल राजकुमार था जो बाद में जैन भिक्षु बन गया।


➤ *तोल्काप्पियम*, तमिल व्याकरण है। पाँचवीं सदी के बाद बहुत सी प्रसिद्ध तमिल रचनाएँ नैतिक एवं दार्शनिक उद्देश्यों से लिखी गयीं, इनमें तिरुवल्लुवर की *तिरुक्कुरल* सबसे प्रसिद्ध है।


**नोट:** *रामकथा के अनेक तमिल संस्करण हैं, जिनमें सबसे प्रसिद्ध कंबन की इरामावतारम् है।*


➤ संगम साहित्य के काव्य को दो श्रेणियों में बाँटा गया है—अकम और पुरम। अकम काव्यों का मूल विषय प्रेम प्रसंग है जबकि पुरम काव्यों का विषय युद्ध है।


➤ संगम साहित्य में हमें तमिल प्रदेश के तीन राज्यों चोल, चेर तथा पाण्ड्य का विवरण प्राप्त होता है। उत्तर-पूर्व में चोल, दक्षिण-पश्चिम में चेर तथा दक्षिण-पूर्व में पाण्ड्य राज्य स्थित था।


➤ संगम युगीन राज्यों में सर्वाधिक शक्तिशाली चोलों का राज्य था। यह पेनार तथा दक्षिणी वेल्लारू नदियों के बीच स्थित था। इसका सबसे प्रतापी राजा करिकाल था।


➤ करिकाल ब्राह्मण मतानुयायी था और इसने ब्राह्मण धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। पट्टिनप्पालै में करिकाल के जीवन और सैन्य अधिग्रहण को दर्शाया गया है। संगम साहित्य के विभिन्न कविताओं में वेण्णि युद्ध का उल्लेख मिलता है, जिसमें करिकाल ने पाण्ड्य तथा चेर सहित ग्यारह राजाओं को पराजित किया था। उसने पुहार या कावेरी पत्तनम शहर की स्थापना की और अपनी राजधानी उरैयुर से कावेरीपट्टनम में स्थानांतरित की। उसने कावेरी नदी के मुहाने पर बाँध बनवाया तथा सिंचाई करने के लिए नहरों का निर्माण कराया। पेरुन्नानुन्नुपादै में करिकाल को संगीत के सप्तस्वरों का विशेषज्ञ बताया गया है।


➤ संगम युग का दूसरा राज्य चेरों का था जो आधुनिक केरल प्रान्त में स्थित था। इस राज्य के कुछ प्रमुख राजा हुए—उदियंजेलल (लगभग 130 ई.), नेदुंजीरल आदन (155 ई.) एवं सेनगुटुवन (180 ई.)।


➤ सेनगुटुवन ने अधिराज की उपाधि ग्रहण की। इसने पत्तिनी नामक धार्मिक सम्प्रदाय को समाज में प्रतिष्ठित किया।


➤ संगम युग का तीसरा राज्य पाण्ड्यों का था जो कावेरी के दक्षिण में स्थित था। इसकी राजधानी मदुरा में थी। पाण्ड्य राजाओं में नेडुंजेलियन (लगभग 210 ई.) सबसे शक्तिशाली था। पाण्ड्यों का पहला उल्लेख मेगास्थनीज ने किया है। उसने इस राज्य को मोतियों के लिए प्रसिद्ध बताया था। नल्लिवकोडन संगम युग का अंतिम ज्ञात पाण्ड्य शासक था।


➤ संगम युग में राज्य को मंडल कहा जाता था।


➤ राजा का जन्मदिन पेरुनल कहलाता था।


➤ संगम युग में मंत्रियों को अमैच्चान या अमैच्चार कहा जाता था।


➤ राजधानी में एक राजसभा होती थी जिसे नालवै कहा जाता था। यह राजा के साथ न्याय का कार्य करता था। राजा देश का प्रधान न्यायाधीश तथा सभी प्रकार के मामलों की सुनवाई की अंतिम अदालत होता था। राजा के न्यायालय को मन्रम कहा जाता था।


➤ चोरी तथा व्यभिचार के अपराध के लिए मृत्युदण्ड दिया जाता था। झूठी गवाही देने पर जीभ काट ली जाती थी।


➤ भूमिकर नकद तथा अनाज दोनों रूपों में अदा किया जाता था। संभवतः यह उपज का छठा भाग होता था, किन्तु कभी-कभी इसे बढ़ाया जाता था। व्यापारियों से सीमा शुल्क एवं चुंगी वसूल की जाती थी।


➤ सेना के सेनापति को एनाडी की उपाधि दी जाती थी। सेना के अग्र टुकड़ी को तुशी तथा पिछले टुकड़ी को कूले कहा जाता था। सेना में वेल्लाल (धनी कृषक) भर्ती किए जाते थे।


➤ सेना चतुरंगिणी होती थी जिसमें अश्व, गज, रथ तथा पैदल सिपाही सम्मिलित थे। नगाड़ा एवं शंख बजाकर सैनिकों को बुलाया जाता था। युद्ध भूमि में वीरगति पाने वाले सैनिकों के सम्मान में पत्थर की मूर्ति बनवाए जाने की प्रथा थी। इस प्रकार की मूर्तियों को नड्डुकल या वीरक्कल कहते थे।


➤ युद्ध में पराजित राजा का आमरण अनशन कर आनुष्ठानिक मृत्यु वरण करने की प्रथा को संगम कविताओं में वटकिरुत्तल कहा गया है।


➤ राजा अपने आवास की रक्षा के लिए सशस्त्र महिलाओं को तैनात करता था।


➤ युद्ध में बंदी स्त्रियों को दासी बनाकर उनसे मंदिरों में दीपक जलाने का कार्य कराया जाता था।


➤ संगम काल में समय जानने के लिए जल घड़ी का प्रयोग किया जाता था।


#### संगमकालीन कुछ अन्य वर्ग


 1. **पुलैयन :** दस्तकारों का एक वर्ग जो रस्सी तथा पशुचर्म की सहायता से चारपाई एवं चटाई बनाने का कार्य करते थे।


 2. **एनियर :** शिकारियों की एक जा


ति


 3. **मलवर :** लूट-पाट करने वाली जाति


 * तमिल प्रदेश में ब्राह्मणों का उदय सर्वप्रथम संगम काल में हुआ जो समय का सबसे प्रतिष्ठित वर्ग था। इसकी हत्या को सबसे बड़ा अपराध माना जाता था। संगम कालीन ब्राह्मण मांस भक्षण करते थे तथा सुरा पीते थे।


 * ब्राह्मणों के पश्चात् संगम युगीन समाज में वेल्लार वर्ग का स्थान था। इसका मुख्य पेशा कृषि कर्म था। वेल्लार के प्रमुख को वेलिर कहा जाता था। खेतों में काम करने वाले मजदूरों को कड़ेसियर कहते थे।


 * संगम साहित्य में व्यापारी वर्ग को वेनिगर कहा गया है।


 * संगम साहित्य में दास प्रथा के अस्तित्व का प्रमाण नहीं मिलता है।


 * तोल्काप्पियम नामक तमिल रचना से ज्ञात होता है कि संगम काल में विवाह को संस्कार के रूप में मान्यता प्रदान की गयी थी। इसमें हिन्दू धर्मशास्त्रों में वर्णित विवाह के आठ प्रकारों (ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस तथा पैशाच) का उल्लेख मिलता है।


 * प्रणय विवाह की मान्यता दी गई थी जिसे पंचतिणै कहा गया है। एक पक्षीय प्रणय को कैक्किणै व अनुचित प्रणय को पेरुन्दिणै कहा गया है।


 * संगम काल में चावल मुख्य खाद्यान्न था। इसे दूध में मिलाकर सांभर नामक खाद्यान्न तैयार किया जाता था।


 * नर्तक, नर्तकियों व गायकों के दल घूम-घूम कर लोगों का मनोरंजन किया करते थे। संगम साहित्य में इन्हें पाणर व विडिलियर कहा गया है।


 * तमिल साहित्य में अव्वैय्यर तथा ओद्धियर जैसी कवयित्रियों की चर्चा हुई है जिससे स्पष्ट है कि इस काल की स्त्रियाँ सुशिक्षित होती थीं।


 * संगम काल के लोग कौवे को शुभ पक्षी मानते थे जो अतिथियों के आगमन की सूचना देता था। कौवे नावियों को सही दिशा का भी बोध कराते थे। इस कारण सागर के मध्य चलने वाले जहाजों के साथ उन्हें ले जाया जाता था।


 * संगम काल में समाधियों के स्थान पर पत्थर गाड़ने की प्रथा थी। इन्हें वीरगल अथवा वीरप्रस्तर कहा जाता था। इनकी पूजा भी होती थी। प्रायः युद्ध में वीरगति प्राप्त सैनिकों के सम्मान में खड़े किए जाते थे।


 * संगम काल में चोलों की समृद्धि का मुख्य कारण उनका सुविकसित वस्त्रोद्योग था।


 * पाण्ड्य राज्य में कोकई, शालियुर एवं चेर राज्य में बन्दर प्रमुख बन्दरगाह था। कोरकई मोती खोजने का प्रमुख पत्तन था।


 * कोरोमण्डल समुद्रतट पर पुदुचेरी से तीन किमी दक्षिण में स्थित अरिकमेडु चोल वंश का एक प्रमुख बन्दरगाह था। इस बन्दरगाह से रोम के साथ व्यापार होता था। 1945 ई. में हुई यहाँ की खुदाई से एक विशाल रोमन बस्ती का पता चला है। यहाँ मनकों के निर्माण का कारखाना भी था। पेरिप्लस में अरिकमेडु को पेडोक कहा गया है।


> **नोट:** संगम काल में ही मिस्र के एक नाविक हिप्पोलस ने मानसूनी हवाओं के सहारे बड़े जहाजों से सीधे समुद्र पार कर सकने की विधि खोजी।


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 * तमिल देश का प्राचीन देवता मुरुगन था। कालान्तर में उसका नाम सुब्रह्मण्य हो गया और स्कन्द-कार्तिकेय के साथ उसका तादात्म्य स्थापित कर दिया गया। हिन्दू धर्म में स्कन्द-कार्तिकेय को शिव-पार्वती का पुत्र माना गया है। स्कन्द का एक नाम कुमार भी है और तमिल भाषा में मुरुगन शब्द का यही अर्थ होता है। मुरुगन का प्रतीक मुर्गा माना जाता था तथा उसके विषय में यह मान्यता थी कि उसे पर्वत पर क्रीड़ा करना अत्यधिक प्रिय है। उसका अस्त्र बर्छा था। कुरवस नामक एक पर्वतीय जनजाति की स्त्री को मुरुगन की पत्नियों में माना गया है।


 * वर्ण का सामाजिक वर्गीकरण संगम कवियों को ज्ञात था।


 * संगम साहित्य में पवित्र या जादुई शक्तियों में विश्वास जताया गया है जिसे


 अनंकू कहा जाता है।

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