जैन, बौद्ध धर्म, अशोक शिलालेख 3



6. जैन धर्म
जैनधर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव थे।  
कल्पसूत्र जैन परंपरा का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है। इसके एक भाग में जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों के जन्म से लेकर निर्वाण तक की विविध घटनाओं का वर्णन किया गया है। उनके जीवन की पाँच प्रमुख घटनाओं को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया है—गर्भाधान, जन्म, गृहत्याग, ज्ञान प्राप्ति व प्रथम उपदेश।  
जैनधर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ थे जो काशी के इक्ष्वाकु वंशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे। इन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में संन्यास-जीवन को स्वीकारा। इनके द्वारा दी गयी शिक्षा थी— 1. हिंसा न करना, 2. सदा सत्य बोलना, 3. चोरी न करना तथा 4. संपत्ति न रखना।  
महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम तीर्थंकर हुए।  
महावीर का जन्म 540 ईसा पूर्व में कुण्डग्राम (वैशाली) में हुआ था। इनके पिता सिद्धार्थ 'ज्ञातृक कुल' के सरदार थे और माता त्रिशला लिच्छवि राजा चेटक की बहन थीं।  
महावीर की पत्नी का नाम यशोदा एवं पुत्री का नाम अनोज्जा प्रियदर्शिनी था।  
महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। इन्होंने 30 वर्ष की उम्र में माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन से अनुमति लेकर संन्यास-जीवन को स्वीकारा था।  
12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद महावीर को जृम्भिक के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए सम्पूर्ण ज्ञान का बोध हुआ। इसी समय से महावीर जिन (विजेता), अर्हत (पूज्य) और निग्रंथ (बंधनहीन) कहलाए।  
महावीर के गर्भाधान के समय उनकी माता त्रिशला ने 14 वस्तुओं का स्वप्न देखा। 14 वस्तुएँ थीं—हाथी, बैल, शेर, देवी लक्ष्मी, कलश, पालकी, सरोवर, छोटी नदी, अग्नि, ध्वज, माला, रत्नों का ढेर, सूर्य एवं चन्द्रमा। उन्होंने अपने सपने के बारे में एक ज्योतिषी से बात की। ज्योतिषी ने बताया कि ये एक ऐसे पुत्र को जन्म देंगी जो या तो राजाध्यक्ष होगा अथवा एक महान संत।  
उत्तरायण सूत्र में महावीर की शिक्षाओं का वर्णन है, जहाँ भिक्षुओं के आचार संहिता का पालन करने का वर्णन किया गया है।  
महावीर ने अपना उपदेश प्राकृत (अर्धमागधी) भाषा में दिया।  
महावीर के अनुयायियों को मूलतः निग्रंथ कहा जाता था।  
महावीर के प्रथम अनुयायी उनके दामाद जामिल बने।  
प्रथम जैन भिक्षुणी नरेश दधिवाहन की पुत्री चम्पा थी।  



> **नोट:** दो जैन तीर्थंकरों ऋषभदेव एवं अरिष्टनेमि के नामों का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। अरिष्ट

नेमि को भगवान कृष्ण का निकट संबंधी माना जाता है।

 * महावीर ने अपने शिष्यों को 11 गणधरों में विभाजित किया था।

 * आर्य सुधर्मा अकेला ऐसा गन्धर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी जीवित रहा और जो जैनधर्म का प्रथम थेरा या मुख्य उपदेशक हुआ।

 * स्वामी महावीर के भिक्षुणी संघ की प्रधान चंदना थी।

 * लगभग 300 ईसा पूर्व में मगध में 12 वर्षों का भीषण अकाल पड़ा, जिसके कारण भद्रबाहु अपने शिष्यों सहित कर्नाटक चले गए। किंतु कुछ अनुयायी स्थूलभद्र के साथ मगध में ही रुक गए। भद्रबाहु के वापस लौटने पर मगध के साधुओं से उनका गहरा मतभेद हो गया जिसके परिणामस्वरूप जैन मत श्वेताम्बर एवं दिगम्बर नामक दो सम्प्रदायों में बँट गया। स्थूलभद्र के शिष्य श्वेताम्बर (श्वेत वस्त्र धारण करने वाले) एवं भद्रबाहु के शिष्य दिगम्बर (नग्न रहने वाले) कहलाए।




 * जैनधर्म के त्रिरत्न हैं—1. सम्यक् दर्शन (सही विश्वास), 2. सम्यक् ज्ञान (सही ज्ञान) और 3. सम्यक् आचरण (सही आचरण)।

 * त्रिरत्न के अनुशीलन में निम्न पाँच महाव्रतों का पालन अनिवार्य है—अहिंसा, सत्य वचन, अस्तेय, अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य।

 * जैन धर्म के चार वर्रा (शिक्षा, अन्न, चिकित्सा और आवास) के सिद्धान्त ने इसे लोकप्रिय बनाने में मदद की।

 * जैनधर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है।

 * जैनधर्म में आत्मा की मान्यता है। जैनियों के अनुसार, जीव (आत्मा) न केवल मनुष्यों व पशु-पक्षियों में वरन पेड़-पौधे, पत्थरों व जल में भी पाया जाता है।

 * जैन धर्म के अनुसार, सृष्टि का निर्माण जीव तथा अजीव नामक दो मूल तत्वों से हुआ है। जीव चेतन तत्व है और अजीव अचेतन जड़ तत्व (पुद्गल, काल, आकाश, धर्म व अधर्म)।

 * महावीर पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करते थे।

 * जैनधर्म के सप्तभंगी ज्ञान के अन्य नाम स्याद्वाद व अनेकांतवाद हैं, जो जैन धर्म का मौलिक सिद्धांत है।

 * जैनधर्म ने अपने आध्यात्मिक विचारों को सांख्य दर्शन से ग्रहण किया।

 * जैनधर्म मानने वाले कुछ राजा थे—उदयिन, वंदराजा, चन्द्रगुप्त मौर्य, कलिंग नरेश खारवेल, राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष, चंदेल शासक।

 * मैसूर के गंग वंश के राजाओं के सेनापति एवं प्रधानमंत्री चामुण्डराय के प्रोत्साहन से कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में 10वीं शताब्दी के मध्य भाग में विशाल बाहुबलि की ग्रेनाइट पत्थर की मूर्ति (गोमतेश्वर की मूर्ति) का निर्माण किया गया। गोमतेश्वर की प्रतिमा कायोत्सर्ग मुद्रा में है। महावीर तपस्या की इस मुद्रा में व अपनी चारों ओर के वातावरण से अनभिज्ञ हैं। उनके पैरों में सांप लपेटे हुए हैं तथा चीटियों ने मिट्टी के घरौंदे बना दिए हैं। यह मूर्ति 18 मी० या 57 फीट ऊँची है एवं एक ही चट्टान को काटकर बनाई गई है। यह विश्व में एक ही पत्थर से बनी बिना किसी सहारे के खड़ी सबसे लंबी मूर्ति है।

 * राजस्थान में माउन्ट आबू पर स्थित जैन मंदिर विमलशाह द्वारा बनवाए गए थे।

 * काटियावाड़ (गुजरात) में पालिताना के निकट शत्रुंजय की पहाड़ियों में एक विशाल जैन तीर्थस्थल है जहाँ एक साथ जुड़े हुए बीसियों मंदिर दर्शनीय हैं।

 * खजुराहो में जैन मंदिरों का निर्माण चंदेल शासकों द्वारा किया गया।

 * आधुनिक तमिलनाडु के पुदुकोट्टई जिले में स्थित सिधन्नावसल या सित्तनवासल गुफाएँ जैन धर्म से संबंधित हैं।

 * मौर्योत्तर युग में मथुरा जैन धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र था। मथुरा कला का संबंध जैनधर्म से है।

 * जैन तीर्थंकरों की जीवनी भद्रबाहु द्वारा रचित कल्पसूत्र में है।

 * 72 वर्ष की आयु में महावीर की मृत्यु (निर्वाण) 468 ईसा पूर्व में बिहार राज्य के पावापुरी (राजगीर) में हो गई।

 * मल्लराजा सृस्तिपाल के राजप्रसाद में महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था।

> **नोट:** *छठी से नवी शताब्दी के बीच बड़ोदरा के पास अकोटा (गुजरात) एवं पश्चिमी भारतीय क्षेत्र में कांस्य की अधिकांश मूर्तियाँ महावीर, पार्श्वनाथ या आदिनाथ जैसे तीर्थंकरों की बनायी जाती थी। इसमें तीर्थंकरों को एक सिंहासन पर विराजमान दिखाया गया और उनमें ये तीर्थंकर अकेले या तीन से 24 तीर्थंकरों के समूह में प्रस्तुत किए गये। इनके अलावा कुछ प्रमुख तीर्थंकरों की शासन देवियों या यक्षिणियों की नारी प्रतिमाएँ भी बनाई जाने लगीं। चक्रेश्वरी आदिनाथ की शासन देवी एवं अंबिका नेमिनाथ की शासन देवी है।*

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### **7. बौद्ध धर्म**

 * बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध थे। इन्हें **एशिया का ज्योति पुंज (Light of Asia)** कहा जाता है।

 * गौतम बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में कपिलवस्तु के लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता शुद्धोधन शाक्य गण के मुखिया थे।

 * इनकी माता मायादेवी की मृत्यु इनके जन्म के सातवें दिन ही हो गई थी। इनका लालन-पालन सौतेली माँ प्रजापति गौतमी ने किया था।

 * इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था।

 * गौतम बुद्ध का विवाह 16 वर्ष की अवस्था में यशोधरा के साथ हुआ। इनके पुत्र का नाम राहुल था।

#### **बुद्ध के जीवन से संबंधित बौद्ध धर्म के प्रतीक**

| घटना | प्रतीक |

| **जन्म** | कमल एवं सांड |

| **गृहत्याग** | घोड़ा |

| **ज्ञान** | पीपल (बोधि वृक्ष) |

| **प्रथम उपदेश** | चक्र |

| **निर्वाण** | पद-चिह्न |

| **मृत्यु** | स्तूप |

**लुसेंट सामान्य ज्ञान** (पृष्ठ 10)

 * सिद्धार्थ जब कपिलवस्तु की सैर पर निकले तो उन्होंने निम्न चार दृश्यों को क्रमशः देखा—1. बूढ़ा व्यक्ति, 2. एक बीमार व्यक्ति, 3. शव एवं 4. एक संन्यासी।

 * सांसारिक समस्याओं से व्यथित होकर सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह-त्याग किया, जिसे बौद्धधर्म में महाभिनिष्क्रमण कहा गया है।

 * गृह-त्याग करने के बाद सिद्धार्थ (बुद्ध) ने वैशाली के आलारकलाम से सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की। आलारकलाम सिद्धार्थ के प्रथम गुरु हुए, जिससे उन्होंने शून्य का ज्ञान प्राप्त किया।

 * आलारकलाम के बाद सिद्धार्थ ने राजगीर के रुद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की, जिससे उन्होंने योग का ज्ञान प्राप्त किया।

 * उरुवेला में सिद्धार्थ को कौण्डिन्य, वप्पा, भादिया, महानामा एवं अस्सागी नामक पाँच साधक मिले।

 * बिना अन्न-जल ग्रहण किए 6 वर्ष* की कठिन तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में वैशाख की पूर्णिमा की रात निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे, पीपल वृक्ष के नीचे, सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ।

 * ज्ञान-प्राप्ति के बाद सिद्धार्थ 'बुद्ध' के नाम से जाने गए। वह स्थान 'बोधगया' कहलाया।

 * बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (ऋषिपत्तनम्) में दिया, जिसे बौद्ध ग्रंथों में 'धर्मचक्रप्रवर्तन' कहा गया है।

 * बुद्ध ने अपने उपदेश जनसाधारण की भाषा पालि में दिए।

 * बुद्ध ने अपने उपदेश कोशल, वैशाली, कौशाम्बी व अन्य राज्यों में दिए (सर्वाधिक उपदेश कोशल देश की राजधानी श्रावस्ती में)।

 * इनके प्रमुख अनुयायी शासक थे—बिम्बिसार, प्रसेनजित व उदयिन।

 * बुद्ध की मृत्यु 80 वर्ष की अवस्था में 483 ईसा पूर्व में कुशीनारा (देवरिया, उत्तर प्रदेश) में चुन्द द्वारा अर्पित भोजन करने के बाद हो गयी, जिसे बौद्ध धर्म में 'महापरिनिर्वाण' कहा गया है।

 * मल्लों ने अत्यन्त सम्मानपूर्वक बुद्ध का अन्त्येष्टि संस्कार किया।

 * एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को आठ भागों में बाँटकर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया।

 * बुद्ध के जन्म एवं मृत्यु की तिथि को चीनी परम्परा के कैन्टोन अभिलेख के आधार पर निश्चित किया गया है।

 * बौद्ध धर्म के बारे में हमें विशद ज्ञान त्रिपिटक (विनयपिटक, सुत्तपिटक व अभिधम्मपिटक) से प्राप्त होता है। तीनों पिटकों की भाषा पालि है। थेरवाद मत की पालि त्रिपिटक सबसे पुराना है।

 * सुत्तपिटक में बुद्ध के धार्मिक सिद्धान्तों को संवाद के रूप में संकलित किया गया है। विनयपिटक में संघ के भिक्षु एवं भिक्षुणी के लिए बनाए गए नियमों का संग्रह किया गया है और इसमें संघ के अनुशासन के तोड़ने पर किए जाने वाले प्रायश्चितों की सूची भी दी गई है। अभिधम्मपिटक में सुत्तपिटक में वर्णित सिद्धान्तों के सुव्यवस्थित अनुशीलन के लिए आवश्यक सूचियों के सारांश तथा प्रश्नोत्तरी का समावेश किया गया है।

> **नोट:** *पालि त्रिपिटकों को पहली शताब्दी ईसा पूर्व में श्रीलंका के शासक वत्तगामिनी की देख-रेख में पहली बार लिपिबद्ध किया गया।*

> * *सुत्तपिटक के पाँच निकाय हैं—दीघ, मज्झिम, संयुक्त, अंगुत्तर, खुद्दक। बुद्ध के पूर्व जन्मों से जुड़ी जातक कथाएँ खुद्दक निकाय की 15 पुस्तकों में से एक है। खुद्दक निकाय में धम्मपद (नैतिक उपदेशों का पद्यात्मक संकलन), थेरगाथा (बौद्ध भिक्षुओं का गीत) और थेरीगाथा (बौद्ध भिक्षुणियों की गीत) है।*

> 

 * बौद्ध धर्म मूलतः अनिश्वरवादी है। इसमें आत्मा की परिकल्पना भी नहीं है।

 * बौद्ध धर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है।

 * तृष्णा को क्षीण हो जाने की अवस्था को ही बुद्ध ने 'निर्वाण' कहा है।

 * "विश्व दुःखों से भरा है" का सिद्धान्त बुद्ध ने उपनिषद् से लिया।

* *अद्भुत भारत (लेखक A.L. बाशम) के अनुसार 49 दिनों की तपस्या के बाद बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।*

 * बुद्ध के अनुयायी दो भागों में विभाजित थे—

   1. **भिक्षुक:** बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जिन्होंने संन्यास ग्रहण किया, उन्हें 'भिक्षुक' कहा गया।

   2. **उपासक:** गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए बौद्ध धर्म अपनाने वालों को 'उपासक' कहा गया।

> **नोट:** *बौद्ध धर्म के वरिष्ठ साध्वी को थेरी के रूप में जाना जाता था।*

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 * बौद्ध संघ में सम्मिलित होने के लिए न्यूनतम आयु-सीमा 15 वर्ष थी।

 * बौद्ध संघ में प्रविष्ट होने को उपसंपदा कहा जाता था।

 * बौद्ध धर्म के त्रिरत्न हैं—बुद्ध, धम्म एवं संघ।



 * चतुर्थ बौद्ध संगीति के बाद बौद्धधर्म दो भागों 'हीनयान' एवं 'महायान' में विभाजित हो गया।

 * बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का आदर्श बोधिसत्व है। बोधिसत्व दूसरे के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए अपने निर्वाण में विलम्ब करते हैं।

 * हीनयान का आदर्श अर्हत् पद को प्राप्त करना है, जो व्यक्ति अपनी साधना से निर्वाण की प्राप्ति करते हैं उन्हें ही अर्हत् कहा जाता है।

 * धार्मिक जुलूस का प्रारंभ सबसे पहले बौद्धधर्म के द्वारा प्रारंभ किया गया। बौद्धों का सबसे पवित्र त्यौहार वैशाख पूर्णिमा है, जिसे 'बुद्ध पूर्णिमा' के नाम से जाना जाता है। इसका महत्व इसलिए है कि बुद्ध पूर्णिमा के ही दिन बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति एवं महापरिनिर्वाण की प्राप्ति हुई।

 * बुद्ध ने सांसारिक दुःखों के सम्बन्ध में चार आर्य सत्यों का उपदेश दिया। ये हैं—1. दुःख 2. दुःख समुदाय 3. दुःख निरोध 4. दुःख निरोधगामिनी प्रतिपदा।

 * इन संसारिक दुःखों से मुक्ति हेतु बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग की बात कही। ये साधन हैं—1. सम्यक् दृष्टि 2. सम्यक् संकल्प 3. सम्यक् वाणी 4. सम्यक् कर्मान्त 5. सम्यक् आजीव 6. सम्यक् व्यायाम 7. सम्यक् स्मृति एवं 8. सम्यक् समाधि

 * बुद्ध के अनुसार अष्टांगिक मार्गों के पालन करने के उपरान्त मनुष्य की भव तृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण प्राप्त हो जाता है।

 * निर्वाण बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य है, जिसका अर्थ है 'दीपक का बुझ जाना' अर्थात् जीवन-मरण चक्र से मुक्त हो जाना। बुद्ध ने निर्वाण-प्राप्ति को सरल बनाने के लिए निम्न दस शीलों पर बल दिया—1. अहिंसा, 2. सत्य, 3. अस्तेय (चोरी न करना), 4. अपरिग्रह (किसी प्रकार की सम्पत्ति न रखना), 5. मद्य-सेवन न करना, 6. असमय भोजन न करना, 7. सुखप्रद बिस्तर पर नहीं सोना, 8. धन-संचय न करना, 9. स्त्रियों से दूर रहना और 10. नृत्य-गान आदि से दूर रहना। गृहस्थों के लिए केवल प्रथम पाँच शील तथा भिक्षुओं के लिए दसों शील मानना अनिवार्य था।

 * बुद्ध ने मध्यम मार्ग (मध्यमा-प्रतिपद) का उपदेश दिया।

 * अनिश्वरवाद के संबंध में बौद्ध धर्म एवं जैन धर्म में समानता है।

 * जातक कथाएँ प्रदर्शित करती हैं कि बोधिसत्व का अवतार मनुष्य रूप में भी हो सकता है तथा पशुओं के रूप में भी।

 * बोधिसत्व के रूप में पुनर्जन्मों की दीर्घ श्रृंखला के अन्तर्गत बुद्ध ने शाक्य मुनि के रूप में अपना अन्तिम जन्म प्राप्त किया, किन्तु इसके उपरान्त मैत्रेय तथा अन्य अनाम बुद्ध अभी अवतरित होने शेष हैं।

 * सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण गन्धार शैली में किया गया लेकि

न बुद्ध की प्रथम मूर्ति संभवतः मथुरा कला में बनी थी।


**इतिहास** (पृष्ठ 11)

 * बोधिवृक्ष के नीचे सर्वप्रथम जो देवालय बना था, उसका निर्माता सम्राट अशोक थी। उस देवालय के चारों ओर जो वेदिका बनी हुई है, वह मौर्यकाल के बाद लगभग 100 ई.पू. में बनाई गयी थी। मंदिर के भीतर बहुत से आलों-दिवालों में जो प्रतिमाएँ स्थापित हैं, वे पाल राजाओं के शासन काल में आठवीं शताब्दी में बनाई गयी थीं। लेकिन वास्तविक महाबोधि मंदिर जिस अवस्था में आज खड़ा है, वह अधिकतर औपनिवेशिक काल में अपने सातवीं शताब्दी के पुराने रूप में बनाया गया था। मंदिर का रूपांकन असामान्य किस्म का है। न तो इसे पूरी तरह द्रविड़ और न ही नागरशैली का मंदिर कहा जा सकता है। यह नागर मंदिर की तरह संकरा है लेकिन द्रविड़ मंदिर की तरह बिना मोड़ सीधे ऊपर की ओर उठा हुआ है।

 * तिब्बत, भूटान एवं पड़ोसी देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार पद्मसंभव (गुरु रिन्पॉछ) ने किया। इनका संबंध बौद्ध धर्म के वज्रयान शाखा से था। इनकी 123 फीट ऊँची मूर्ति हिमाचल प्रदेश रेवाल सर झील में है।

> **नोट:** *भारत में उपासना की जाने वाली प्रथम मूर्ति संभवतः बुद्ध की थी।*

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 * स्तूप वैदिक काल से भारत में प्रचलित शवाधान टीले थे, जिसमें मृतकों के अवशेष और राख को रखा जाता था।

 * अशोक के शासनकाल में स्तूप कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गयी। उसने अपने राज्य काल के दौरान लगभग 84,000 स्तूप बनवाए।



 * वैदिक परंपरा से प्रेरित स्तूपों को बौद्धों द्वारा लोकप्रिय बनाया गया। बुद्ध के मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेष आठ भागों में विभाजित कर स्तूपों के नीचे रखे गए थे।

 * स्तूपों को पाँच श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है—

   1. **अवशेष स्तूप:** जिसमें बुद्ध और अन्य धार्मिक व्यक्तियों के अवशेष रखे गए हैं जैसे—साँची का स्तूप।

   2. **वस्तु स्तूप:** जिसमें बुद्ध या उनके शिष्यों से संबंधित वस्तुएँ रखी गई हैं जैसे-वैशाली का स्तूप।

   3. **स्मारक स्तूप:** जो बुद्ध और उनके शिष्यों के जीवन की घटनाओं को याद करने के लिए बनाए गए हैं। जैसे—श्री लंका के अनुराधापुर का स्तूप।

   4. **प्रतीकात्मक स्तूप:** जो बौद्ध धर्मशास्त्र के विभिन्न पहलुओं के प्रतीक के लिए बनाए गए हैं। जैसे—लेह स्तूप।

   5. **मन्नत स्तूप:** जो यात्राओं के उपलक्ष्य में या आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए बनाए गए।

 * अशोक द्वारा बनाए गए स्तूपों में सबसे प्रसिद्ध मध्य प्रदेश का साँची स्तूप है।

 * उत्तर प्रदेश में पिपरहवा का स्तूप सबसे प्राचीनतम स्तूप है।

 * स्तूप आमतौर पर अवशेषों का निक्षेपागार होता था।

 * बौद्ध परंपरा में स्तूप एक संकल्प-अर्पित या स्मारक संरचना होती थी।

> **नोट:** *भाजा गुफाएँ ईसापूर्व दूसरी शताब्दी के दौरान निर्मित 22 चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं का एक समूह है। यह महाराष्ट्र के लोनावाला के पास पुणे जिले में स्थित है। यह हीनयान बौद्ध संप्रदाय से संबंधित है। गुफा में कई स्तूप हैं।*

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 * बंगाल क्षेत्र में पाल राजवंश के शासन काल के दौरान बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के विकास के प्रभाव से बौद्ध देवियों की पूजा की जाने लगी थी। इसके अंतर्गत तारा देवी की मूर्तियां अत्यंत लोकप्रिय हुईं। इन मूर्तियों में तारा को एक सिंहासन पर विराजमान दिखाया गया है, उनके साथ एक टेढ़ी कमलनाग उगी हुई दिखाई गयी है और उनका दाहिना हाथ अभयमुद्रा में उठा हुआ दिखाया गया है।

> **नोट:** *बोधिसत्व पद्मपाणि की पेंटिंग 5वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के अजंता मठ की गुफा-1 में देखी जा सकती है। अजंता की ये गुफा वर्तमान औरंगाबाद महाराष्ट्र में स्थित हैं। यहाँ की गुफाएँ सभी तीनों रूपों वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला से संबंधित हैं। यहाँ बड़े चैत्य विहार हैं जिन्हें मूर्तियों और चित्रों से सजाया गया है।*

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### **8. शैव धर्म**

 * भगवान शिव की पूजा करने वालों को शैव एवं शिव से संबंधित धर्म को शैवधर्म कहा गया है। शिवलिंग-उपासना का प्रारंभिक पुरातात्विक साक्ष्य हड़प्पा संस्कृति के अवशेषों से मिलता है।

 * ऋग्वेद में शिव के लिए 'रुद्र' नामक देवता का उल्लेख है।

 * अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पशुपति एवं भूपति कहा गया है।

 * लिंग-पूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मत्स्यपुराण में मिलता है।

 * महाभारत के अनुशासन पर्व से भी लिंग-पूजा का वर्णन मिलता है।

| सम्प्रदाय | संस्थापक |

| **आजीवक** | मख्खलिपुत्र गोशाल |

| **घोर अक्रियावादी** | पूरण कश्यप |

| **यदृच्छावाद** | आचार्य अजित |

| **भौतिकवादी** | पकुध कच्चायन (भौतिक दर्शन) |

| **अनिश्चयवादी** | संजय वेट्ठलिपुत्र |

 * रुद्र के पत्नी के रूप में पार्वती का नाम तैत्तिरीय आरण्यक में मिलता है।

 * शिव की पत्नी की सौम्य रूप है: पद्मा, पार्वती, उमा, गौरी एवं भैरवी।

 * 'वामन पुराण' में शैव सम्प्रदाय की संख्या चार बतायी गयी है। ये हैं—1. पाशुपत, 2. कापालिक, 3. कालामुख, 4. लिंगायत।

 * पाशुपत सम्प्रदाय शैवों का सर्वाधिक प्राचीन सम्प्रदाय है। इसके संस्थापक लकुलीश थे जिन्हें भगवान शिव के 18 अवतारों में से एक माना जाता है।

 * पाशुपत सम्प्रदाय के अनुयायियों को पंचार्थिक कहा गया है। इस मत का प्रमुख सैद्धांतिक ग्रंथ पाशुपत सूत्र है। श्रीकर पंडित एक विख्यात पाशुपत आचार्य थे।

 * कापालिक सम्प्रदाय के इष्टदेव भैरव थे। इस सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र श्री शैल नामक स्थान था।

 * कालामुख सम्प्रदाय के अनुयायियों को शिव पुराण में महाव्रतधर कहा गया है। इस सम्प्रदाय के लोग नर-कपाल में ही भोजन, जल तथा सुरापान करते हैं और साथ ही अपने शरीर पर चिता की भस्म मलते हैं।

 * लिंगायत सम्प्रदाय दक्षिण में प्रचलित था। इन्हें जंगम भी कहा जाता था। इस सम्प्रदाय के लोग शिव लिंग की उपासना करते थे।

 * 'शून्य संपादने' लिंगायतों का मुख्य धार्मिक ग्रंथ है।

 * बसव पुराण में लिंगायत सम्प्रदाय के प्रवर्तक अल्लभ प्रभु तथा उनके शिष्य बासव को बता

या गया है। इस सम्प्रदाय को वीरशैव सम्प्रदाय भी कहा जाता है।

**नोट :** वासव व उनका भतीजा चन्ना बासव कर्नाटक के कलचुरी राजाओं के दरबार में रहते थे। जैनों के साथ कठिन संघर्ष के उपरान्त उन्होंने अपने मत की स्थापना की थी। उन्होंने जाति प्रथा का कड़ा विरोध किया और उपवास, प्रीतिभोज, तीर्थयात्रा एवं बलि प्रथा को अस्वीकार किया। बाल-विवाह का विरोध किया और विधवा विवाह की अनुमति दी।

 * 12वीं शताब्दी में राजा कुलोत्तुंगा II के शासनकाल में सेक्किलार द्वारा लिखित तिरुतोंदर-पुराणम, जिसे थिरुतोंडा थोगई के नाम से भी जाना जाता है तमिल में पाँचवें वेद के रूप में माना जाता है और यह शैव परंपरा में बारहवीं पुस्तक भी है। यह भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित एक भक्ति पाठ है और इसे तमिल शैववाद में एक महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। यह पाठ तमिलनाडु में भगवान शिव के भक्तों द्वारा व्यापक रूप से पढ़ा और सुनाया जाता है। इसे तमिलनाडु में शैव परंपरा के अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक ज्ञान का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। यह तमिल शैववाद के विहित कवियों, तिरुसठ नयनारों की कहानियाँ बताता है।

 * 10वीं शताब्दी में मत्स्येन्द्रनाथ ने नाथ सम्प्रदाय की स्थापना की। इस सम्प्रदाय का व्यापक प्रचार-प्रसार बाबा गोरखनाथ के समय में हुआ। गोरखनाथ ने वर्णव्यवस्था तथा ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों की आलोचना की। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त को तंत्र कहा जाता है। इसकी सदस्यता बिना जाति भेद सबके लिए खुली थी।

 * दक्षिण भारत में शैव धर्म चालुक्य, राष्ट्रकूट, पल्लव एवं चोलों के समय लोकप्रिय रहा।

 * पल्लव काल में शैव धर्म का प्रचार-प्रसार नयनारों द्वारा किया गया। नयनार सन्तों की संख्या 63 बतायी गयी है जिनमें अप्पार, तिरुज्ञान, सम्बन्दर एवं सुन्दर मूर्ति आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

**नोट :** *पशुपतिनाथ मंदिर : नेपाल की राजधानी काठमांडू से तीन किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में बागमती नदी के किनारे देवपाटन गाँव में स्थित एक शिव मंदिर है। नेपाल के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनने से पहले यह मंदिर राष्ट्रीय देवता भगवान पशुपति नाथ का मुख्य निवास माना जाता था। इस मंदिर परिसर को सन् 1979 में यूनेस्को विश्व-सांस्कृतिक विरासत स्थल के रूप में सूची-बद्ध किया गया। मुख्य मंदिर का निर्माण वास्तुकला की नेपाली पैगोडा शैली में हुआ है।*

 * एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूटों ने करवाया।

 * चोल शासक राजराज प्रथम ने तंजौर में प्रसिद्ध राजराजेश्वर शैव मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे बृहदीश्वर मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।

 * कुषाण शासकों की मुद्राओं पर शिव एवं नन्दी का एक साथ अंकन प्राप्त होता है।

**नोट :** *शिव अद्वैत विचारधारा के मुख्य प्रवर्तक श्रीकांत शिवाचार्य हैं, इनके अनुसार शिव और ब्रह्म एक और समान हैं।*

### 9. वैष्णव धर्म

 * वैष्णव धर्म के विषय में प्रारंभिक जानकारी उपनिषदों से मिलती है। इसका विकास भगवत धर्म से हुआ। नारायण के पूजक मूलतः पंचरात्र कहे जाते थे।

 * वैष्णव धर्म के प्रवर्तक कृष्ण थे, जो वृषण कबीले के थे और जिनका निवास स्थान मथुरा था।

 * कृष्ण का उल्लेख सर्वप्रथम छांदोग्य उपनिषद में देवकी-पुत्र और अंगिरस के शिष्य के रूप में हुआ है। वासुदेव कृष्ण का सबसे प्रारंभिक अभिलेखीय उल्लेख बेसनगर स्तम्भ अभिलेख में पाया गया है।

 * विष्णु के दस अवतारों का उल्लेख मत्स्यपुराण में मिलता है। दस अवतार इस प्रकार हैं—मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध एवं कल्कि। गुप्तकाल में विष्णु का वराह अवतार सर्वाधिक प्रसिद्ध था।

 * वैष्णव धर्म में ईश्वर को प्राप्त करने के लिए सर्वाधिक महत्व भक्ति को दिया गया है।

**नोट :** *भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र में छः तिल्लियाँ हैं।*




**नोट :** *अंकोरवाट का मंदिर कंबोडिया (कंबोज) के राजा सूर्यवर्मा II (1113 ई.-1150 ई.) ने बनवाया था। इस मंदिर में लगभग 10.5 फीट ऊँची भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित है।*

### 10. इस्लाम धर्म

 * इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब थे।

 * हजरत मुहम्मद साहब का जन्म 570 ई. में मक्का में प्रमुख कुरैश कबीले में हुआ। उनके पिता अब्दुल्ला और माता अमीना थीं। उनका लालन-पालन उनके चाचा अबू तालिब ने किया था।

 * हजरत मुहम्मद साहब को 610 ई. में मक्का के पास हीरा नामक गुफा में ज्ञान की प्राप्ति हुई।

 * 24 सितम्बर, 622 ई. को पैगम्बर के मक्का से मदीना की यात्रा इस्लाम जगत में मुस्लिम संवत् (हिजरी संवत्) के नाम से जाना जाता है।

 * मुहम्मद की शादी 25 वर्ष की अवस्था में खदीजा नामक विधवा के साथ हुई।

 * मुहम्मद की पुत्री का नाम फातिमा एवं दामाद का नाम अली है।

 * देवदूत जिब्रिल (Gabriel) ने पैगम्बर मुहम्मद साहब को कुरान अरबी भाषा में संप्रेषित की। कुरान इस्लाम धर्म का पवित्र ग्रंथ है। यह पवित्र ग्रंथ 114 अध्यायों में बँटी हुई है, इसमें 6,360 पद हैं।

 * पैगम्बर मुहम्मद साहब ने कुरान की शिक्षाओं का उपदेश दिया।

 * हजरत मुहम्मद साहब की मृत्यु 8 जून, 632 ई. को हुई। इन्हें मदीना में दफनाया गया।

 * मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद इस्लाम सुन्नी तथा शिया नामक दो पंथों में विभाजित हो गया।

 * सुन्नी उन्हें कहते हैं जो सुन्ना में विश्वास करते हैं। सुन्ना पैगम्बर मुहम्मद साहब के कथनों तथा कार्यों का विवरण है।

 * शिया अली की शिक्षाओं में विश्वास करते हैं तथा उन्हें मुहम्मद साहब का न्यायसम्मत उत्तराधिकारी मानते हैं। अली, मुहम्मद साहब के दामाद थे।

 * अली की 661 ई. में हत्या कर दी गई। अली के पुत्र हुसैन की हत्या 680 ई. में कर्बला (इराक) नामक स्थान पर कर दी गई। इन दोनों हत्या ने शिया को निश्चित मत का रूप दे दिया।

 * पैगम्बर मुहम्मद साहब के उत्तराधिकारी 'खलीफा' कहलाए।

 * इस्लाम जगत में खलीफा पद 1924 ई. तक रहा। 1924 ई. में इसे तुर्की के शासक मुस्तफा कमालपाशा ने समाप्त कर दिया।

 * इब्न ईशाक ने सर्वप्रथम पैगम्बर साहब का जीवन-चरित लिखा।


> **-** मुहम्मद साहब पैगम्बर के जन्म-दिन पर ईद-ए-मिलाद-उन-नवी पर्व मनाया जाता है।

> **-** भारत में सर्वप्रथम इस्लाम का आगमन अरबों के जरिए हुआ। 712 ई. में अरबों ने सिन्ध जीत लिया और सबसे पहले भारत के इसी भाग में इस्लाम एक महत्वपूर्ण धर्म बना।

> 

**नोट:** *नमाज़ के दौरान मुसलमान मक्का की तरफ मुँह करके खड़े होते हैं। भारत से मक्का पश्चिम की ओर पड़ता है। मक्का की ओर की दिशा को किबला कहा जाता है।*

### 11. ईसाई धर्म

> **-** ईसाई धर्म के संस्थापक ईसा मसीह हैं व प्रमुख ग्रंथ बाइबिल है।

> **-** ईसा मसीह का जन्म जेरुशलम के निकट बैथलेहम नामक स्थान पर हुआ था। ईसा के जन्म-दिवस को क्रिसमस के रूप में मनाया जाता है।

> **-** ईसा मसीह के माता का नाम मेरी और पिता का नाम जोसेफ है।

> **-** ईसा ने अपने जीवन के प्रथम 30 वर्ष एक बढ़ई के रूप में बैथलेहम के निकट नाज़रेथ (इजराइल) में बिताए।

> **-** ईसा मसीह के प्रथम दो शिष्य थे—एंड्रूस एवं पीटर।

> **-** ईसा मसीह को सूली पर रोमन गवर्नर पोंटियस ने चढ़ाया।

> **-** ईसा मसीह को 33 ई. में सूली पर चढ़ाया गया।

> **-** ईसाई धर्म का सबसे पवित्र चिह्न क्रॉस है।

> **-** ईसाई त्रित्व में विश्वास रखते हैं, वे हैं—ईश्वर-पिता, ईश्वर-पुत्र (ईसा), ईश्वर-पवित्र आत्मा।

> 

**नोट:** *12वीं शताब्दी से फ्रांस में आरंभिक भवनों की तुलना में अधिक ऊँचे व हल्के चर्चों के निर्माण प्रारंभ हुए। वास्तुकला की यह शैली गॉथिक नाम से जानी जाती है। इस वास्तुकलात्मक शैली के सर्वोत्कृष्ट उदाहरणों में एक पेरिस का नाट्रेडम चर्च है।*

### 12. पारसी धर्म

> **-** पारसी धर्म के पैगम्बर जरथुस्ट्र (ईरानी) थे। इनके शिक्षाओं का संकलन जेन्दा अवेस्ता नामक ग्रंथ में है, जो पारसियों का धार्मिक ग्रंथ है।

> **-** इनकी मूल शिक्षा का सूत्र है: सद्-विचार, सद्-वचन तथा सद्-कार्य।

> **-** इसके अनुयायी एक ईश्वर 'अहुर' को मानते हैं।

> **-** इस धर्म के अनुयायियों को 'अग्नि-पूजक' भी कहा जाता है।

> 

### 13. मगध राज्य का उत्कर्ष

> **-** मगध के सबसे प्राचीन वंश के संस्थापक बृहद्रथ था। इसकी राजधानी गिरिव्रज (राजगृह) थी। जरासंध बृहद्रथ का पुत्र था।

> **-** हर्यक वंश के संस्थापक बिम्बिसार मगध की गद्दी पर 544 ई.पु. (बौद्ध ग्रंथों के अनुसार) में बैठा था। वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था। यह प्रथम भारतीय राजा था जिसने प्रशासनिक व्यवस्था पर बल दिया।

> **-** बिम्बिसार ने ब्रह्मदत्त को हराकर अंग राज्य को मगध में मिला लिया।

> **-** बिम्बिसार ने राजगृह का निर्माण कर उसे अपनी राजधानी बनाया।

> **-** बिम्बिसार ने मगध पर करीब 52 वर्षों तक शासन किया।

> **-** महात्मा बुद्ध की सेवा में बिम्बिसार ने राजवैद्य जीवक को भेजा। अवन्ति के राजा प्रद्योत जब पाण्डु रोग से ग्रसित थे उस समय भी बिम्बिसार ने जीवक को उनकी सेवा-सुश्रूषा के लिए भेजा था।

> **-** बिम्बिसार ने वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपने साम्राज्य का विस्तार किया। इसने कोशल नरेश प्रसेनजित की बहन महाकोशला से, वैशाली के चेटक की पुत्री चेल्लना से तथा मद्र देश (आधुनिक पंजाब) की राजकुमारी क्षेमा से शादी की।

> **-** बिम्बिसार की हत्या उसके पुत्र अजातशत्रु ने कर दी और वह 493 ईसा पूर्व में मगध की गद्दी पर बैठा। इसका उपनाम कुणिक था। वह प्रारंभ में जैन धर्म का अनुयायी था।

> **-** अजातशत्रु ने 32 वर्षों तक मगध पर शासन किया।

> **-** अजातशत्रु के सुयोग्य मंत्री का नाम वर्षकार (वरस्कार) था। इसी की सहायता से अजातशत्रु ने वैशाली पर विजय प्राप्त की।

> **-** जैन ग्रंथों से पता चलता है कि लिच्छवियों से युद्ध में अजातशत्रु ने प्रथम बार रथ मूसल (आधुनिक टैंकों के समान) तथा महाशिला कण्टक (गुलेल (catapult) जैसे दो गुप्त हथियारों का प्रयोग किया।

> **-** 461 ई.पु. में अपने पिता की हत्या कर उदाइन मगध की गद्दी पर बैठा।

> **-** उदाइन ने पाटलिग्राम की स्थापना की। वह जैनधर्म का अनुयायी था।

> **-** हर्यक वंश का अंतिम राजा उदाइन का पुत्र नागदशक था।

> **-** नागदशक को उसके अमात्य शिशुनाग ने 412 ईसा पूर्व में अपदस्थ करके मगध पर शिशुनाग वंश की स्थापना की। शिशुनाग ने अपनी राजधानी पाटलिपुत्र से हटाकर वैशाली में स्थापित की।

> **-** शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक पुनः राजधानी को पाटलिपुत्र ले गया। शिशुनाग वंश का अंतिम राजा नंदिवर्धन था।

> **-** नंदवंश का संस्थापक महापद्मनंद व अंतिम शासक घनानंद था। यह सिकन्दर का समकालीन था। इसे चन्द्रगुप्त मौर्य ने युद्ध में पराजित किया और मगध पर एक नये वंश 'मौर्य वंश' की स्थापना की।

> 

### 14. सिकन्दर

> **-** सिकन्दर का जन्म 356 ई. पृ. में हुआ। उसका पिता फिलिप था।

> **-** फिलिप 359 ईसा पूर्व में मकदुनिया का शासक बना। इसकी हत्या 329 ईसा पूर्व में कर दी गयी।

> **-** सिकन्दर अरस्तू का शिष्य था।

> **-** सिकन्दर ने भारत-विजय का अभियान 326 ईसा पूर्व में प्रारंभ किया।

> **-** सिकन्दर का सेनापति सेल्युकस निकेटर था।

> **-** सिकन्दर को पंजाब के शासक पोरस के साथ युद्ध करना पड़ा, जिसे हाइडेस्पीज के युद्ध या झेलम (वितस्ता) का युद्ध के नाम से जाना जाता है। सिकन्दर की सेना ने व्यास नदी (प्राचीन नाम विपाशा, यूनानी नाम हाइफासिस) के पश्चिमी तट पर पहुँचकर उसे पार करने से इन्कार कर दिया।

> **-** सिकन्दर स्थल-मार्ग द्वारा 325 ईसा पूर्व में भारत से लौटा।

> **-** सिकन्दर की मृत्यु 323 ईसा पूर्व में बेबीलोन में 33 वर्ष की अवस्था में हो गयी। सिकन्दर का जल-सेनापति का नाम निर्याकस था।

> **-** सिकन्दर का प्रिय घोड़ा बहूकेफला था। इसी के नाम पर इसने झेलम नदी के तट पर बहूकेफला नामक नगर बसाया।

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### 15. मौर्य साम्राज्य

> **-** मौर्य वंश का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई.पू. में हुआ था।

> **-** जस्टिस ने चन्द्रगुप्त मौर्य को सेन्ड्रोकोट्टस कहा है, जिसकी पहचान विलियम जोन्स ने चन्द्रगुप्त मौर्य से की है।

> **-** विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त मौर्य के लिए वृषल (आशय—निम्न कुल में उत्पन्न) शब्द का प्रयोग किया गया।

> **-** घनानंद को हराने में चाणक्य (कौटिल्य/विष्णुगुप्त) ने चन्द्रगुप्त मौर्य की मदद की थी, जो बाद में चन्द्रगुप्त का प्रधानमंत्री बना। इसके द्वारा लिखित पुस्तक अर्थशास्त्र है, जिसका संबंध राजनीति से है।

> 

**नोट:** *कौटिल्य ने अर्थशास्त्र में राज्य की प्रकृति का वराीन किया है। उसने राज्य के सात अंग बताए। ये अंग हैं— स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दंड या सेना और मित्र। इसे ही सप्तांग कहते हैं।*

> **-** चन्द्रगुप्त मगध की राजगद्दी पर 322 ईसा पूर्व में बैठा। चन्द्रगुप्त जैन धर्म का अनुयायी था।

> **-** चन्द्रगुप्त ने अपना अंतिम समय कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया।

> **-** चन्द्रगुप्त ने 305 ईसा पूर्व में सेल्युकस निकेटर को हराया।

> **-** सेल्युकस निकेटर ने अपनी पुत्री कानेलिया की शादी चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ कर दी और युद्ध की संधि-शर्तों के अनुसार चार प्रांत काबुल, कन्धार, हेरात एवं मकरान चन्द्रगुप्त को दिए।

> **-** चन्द्र

गुप्त मौर्य ने जैनी गुरु भद्रबाहु से जैनधर्म की दीक्षा ली थी।


➤ मेगस्थनीज सेल्युकस निकेटर का राजदूत था, जो चन्द्रगुप्त के दरबार में रहता था।

➤ मेगस्थनीज द्वारा लिखी गयी पुस्तक इंडिका है। मेगस्थनीज के अनुसार-सम्राट का जनता के सामने आने के अवसरों पर शोभा-यात्रा के रूप में जश्न मनाया जाता है। उन्हें एक सोने के पालकी में ले जाया जाता है। उनके अंगरक्षक सोने और चाँदी से अलंकृत हाथियों पर सवार रहते हैं। कुछ अंगरक्षक पेड़ों को लेकर चलते हैं। इन पेड़ों पर प्रशिक्षित तोतों का झुण्ड रहता है जो सम्राट के सिर के चारों तरफ चक्कर लगाता रहता है। राजा सामान्यतः हथियारबंद महिलाओं से घिरे होते हैं। उनके खाना खाने के पहले खास नौकर उस खाने को चखते हैं। वे लगातार दो रात एक ही कमरे में नहीं सोते थे। *पाटलिपुत्र के बारे में:* पाटलिपुत्र एक विशाल प्राचीर से घिरा है, जिसमें 570 बुर्ज और 64 द्वार हैं। दो और तीन मंजिल वाले घर लकड़ी और कच्ची ईंटों से बने हैं। राजा का महल भी काठ का बना है जिसे पत्थर की नकाशी से अलंकृत किया गया है। यह चारों तरफ से उद्यानों और चिड़ियों के लिए बने बसेरों से घिरा है।

➤ चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्युकस के बीच हुए युद्ध का वर्णन एप्यियानस ने किया है। प्लूटार्क के अनुसार चन्द्रगुप्त ने सेल्युकस को 500 हाथी उपहार में दिए थे।

➤ चन्द्रगुप्त की मृत्यु 298 ई.पू. में श्रवणबेलगोला में उपवास द्वारा हुई।

### बिन्दुसार

➤ चन्द्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिन्दुसार हुआ, जो 298 ईसा पूर्व में मगध की राजगद्दी पर बैठा। इसे अमित्रघात के नाम से जाना जाता है। अमित्रघात का अर्थ है—शत्रु विनाशक।

➤ बिन्दुसार आजीवक सम्प्रदाय का अनुयायी था।

**नोट:** *आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना मक्खलिपुत्र गोसाल ने की थी।*

➤ 'वायुपुराण' में बिन्दुसार को भद्रसार (या वारिसार) कहा गया है।

➤ स्ट्रैबो के अनुसार सीरियन नरेश एण्टियोकस ने बिन्दुसार के दरबार में डाइमेकस नामक राजदूत भेजा। इसे ही मेगस्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है।

➤ जैन ग्रंथों में बिन्दुसार को सिंहसेन कहा गया है।

➤ बिन्दुसार के शासनकाल में तक्षशिला (सिन्धु एवं झेलम नदी के बीच) में हुए दो विद्रोहों का वर्णन है। इस विद्रोह को दबाने के लिए बिन्दुसार ने पहले सुसीम को और बाद में अशोक को भेजा।

➤ एथीनियस के अनुसार बिन्दुसार ने सीरिया के शासक एण्टियोकस-I से मदिरा, सूखे अंजीर एवं एक दार्शनिक भेजने की प्रार्थना की थी।

➤ बौद्ध विद्वान् तारानाथ ने बिन्दुसार को 16 राज्यों का विजेता बताया है।

➤ बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली एक मन्त्रिपरिषद थी जिसका प्रधान खल्लाटक था।

### अशोक

➤ बिन्दुसार का उत्तराधिकारी अशोक महान हुआ जो 269 ईसा पूर्व में मगध की राजगद्दी पर बैठा। अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी था। *(दिव्यावदान के अनुसार)*

➤ राजगद्दी पर बैठने के समय अशोक अवन्ति का राज्यपाल था।

➤ मासकी, गुर्जरा, नेत्तूर एवं उडेगोलम के लेखों में अशोक का नाम अशोक मिलता है।

| मौर्य प्रांत | राजधानी |

| उत्तरापथ | तक्षशिला |

| अवन्ति राष्ट्र | उज्जयिनी |

| कलिंग | तोसली |

| दक्षिणापथ | सुवर्णगिरि |

| प्राशी (पूर्वी प्रांत) | पाटलिपुत्र |

➤ अशोक का इतिहास हमें मुख्यतः उसके अभिलेखों से ही ज्ञात होता है। इसके अभिलेखों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है— 1. शिलालेख 2. स्तम्भलेख 3. गुहालेख

**नोट:** *डी. आर. भंडारकर जैसे इतिहासकार ने अभिलेखों के आधार पर ही अशोक का इतिहास लिखने का प्रयास किया है।*

➤ कर्नाटक के कालाबुरगी जिले के चितापुर तालुक के कंगनहल्ली से प्राप्त उभारदार मूर्तिशिल्प (रिलीफ स्कल्पचर) शिलालेख में अशोक के प्रस्तर रूपचित्र के साथ 'राण्यो असोक' (राजा अशोक) उल्लिखित है।

**नोट:** *कंगनहल्ली भीमा नदी के बाएँ तट पर स्थित है।*

➤ भाब्रू अभिलेख में अशोक ने स्वयं को मगध का राजा बताया है।

➤ पुराणों में अशोक को अशोकवर्धन कहा गया है। देवानाम्प्रिय प्रियदर्शी अशोक का ही नाम था।

➤ अशोक ने अपने अभिषेक के 8 वर्ष बाद लगभग 261 ईसा पूर्व में कलिंग पर आक्रमण किया और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया। *(उल्लेख 13 वें शिलालेख में)*

➤ प्लिनी का कथन है कि मिस्र का राजा फिलाडेल्फस [टॉलेमी II] ने पाटलिपुत्र में दियानीसियस नाम का एक राजदूत भेजा था।

➤ उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने अशोक को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी।

**नोट:** *अशोक पहले ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। कल्हण के राजतरंगिणी से पता चलता है कि वह शैव धर्म का उपासक था। निग्रोध के प्रवचन सुनकर उसने बौद्ध धर्म को अपना लिया।*

➤ अशोक एक उपासक के रूप में अपने राज्याभिषेक के 10वें वर्ष बोधगया की, 12वें वर्ष निगालि सागर की एवं 20वें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की।

➤ अहरौरा लेख में यह घोषणा की गई है कि अशोक व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म का अनुयायी था। रुम्मिनदेई स्तम्भ अभिलेख और निगाली सागर स्तम्भ अभिलेख बौद्धमत में अशोक की आस्था का स्पष्ट प्रमाण देते हैं।

#### अशोक के प्रमुख शिलालेखों का स्थान एवं संबंधित राज्य

| क्र. | शिलालेखों का स्थान | संबंधित राज्य |

| 1. | शाहबाज़गढ़ी | पेशावर (पाकिस्तान) |

| 2. | मनसेहरा | हजारा (पाकिस्तान) |

| 3. | कालसी | उत्तराखण्ड |

| 4. | गिरनार | गुजरात |

| 5. | धौली व जौगढ़ | ओडिशा |

| 6. | एर्रगुडि, राजुल, मंडगिरि | आंध्र प्रदेश |

| 7. | सोपारा | महाराष्ट्र |

| 8. | रूपनाथ तथा गुर्जरा | मध्य प्रदेश |

| 9. | सासाराम | बिहार |

| 10. | भाब्रू (वैराट) | राजस्थान |

| 11. | मासकी, गोविमठ, ब्रह्मगिरि, सिद्धपुर, जंटिंगरामेश्वर, कंगनहल्ली, पालकिगुण्डू | कर्नाटक |

| 12. | अहरौरा | उत्तर प्रदेश |

#### अशोक के प्रमुख शिलालेख एवं उनमें वर्णित विषय

| शिलालेख | विषय |

| **पहला** | इसमें पशुबलि की निंदा की गयी है। |

| **दूसरा** | मनुष्य व पशु दोनों की चिकित्सा-व्यवस्था का उल्लेख है। |

| **तीसरा** | इसमें राजकीय अधिकारियों को यह आदेश दिया गया है कि वे हर पाँचवें वर्ष के उपरान्त दौरे पर जाएँ। इसमें कुछ धार्मिक नियमों का भी उल्लेख है। |

| **चौथा** | इसमें भेरीघोष की जगह धम्मघोष की घोषणा की गयी है। |

| **पाँचवाँ** | इसमें धर्म-महामात्रों की नियुक्ति की जानकारी मिलती है। |

| **छठा** | इसमें आत्म-नियंत्रण की शिक्षा दी गयी है। |

| **7वाँ व 8वाँ** | इनमें अशोक की तीर्थ-यात्राओं का उल्लेख है। |

| **नौवाँ** | इसमें सच्ची भेंट तथा सच्चे शिष्टाचार का उल्लेख है। |

| **दसवाँ** | इसमें अशोक ने आदेश दिया है कि राजा तथा उच्च अधिकारी हमेशा प्रजा के हित 

में सोचें। |

| **ग्यारहवाँ** | इसमें धम्म की व्याख्या की गयी है। |

| **बारहवाँ** | इसमें स्त्री महामात्रों की नियुक्ति एवं सभी प्रकार के विचारों के सम्मान की बात कही गयी है। |

| **तेरहवाँ** | इसमें कलिंग युद्ध का वर्णन एवं अशोक के हृदय-परिवर्तन की बात कही गयी है। इसी में पाँच यवन राजाओं के नामों का उल्लेख है, जहाँ उसने धम्म प्रचारक भेजे। |

| **चौदहवाँ** | अशोक ने जनता को धार्मिक जीवन बिताने के लिए प्रेरित किया। |

➤ अशोक ने आजीवकों को रहने हेतु बराबर की पहाड़ियों में चार गुफाओं का निर्माण करवाया, जिनका नाम कर्ज, चौपार, सुदामा तथा विश्व झोपड़ी था। अशोक के पौत्र दशरथ ने आजीविकों को नागार्जुन गुफा प्रदान की थी। अशोक के 7वें स्तम्भ लेख में आजीविकों का उल्लेख किया गया है तथा महामात्रों को आजीविकों के हितों का ध्यान रखने के लिए कहा गया है।

➤ अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा। बौद्ध परंपरा और उनके लिपियों के अनुसार अशोक ने 84,000 स्तूपों का निर्माण किया था।

➤ भारत में शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम अशोक ने किया।

➤ अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक एवं अरमाइक लिपि का प्रयोग हुआ है।

➤ ग्रीक एवं अरमाइक लिपि का अभिलेख अफगानिस्तान से, खरोष्ठी लिपि का अभिलेख शाहबाज़गढ़ी एवं मनसेहरा (पाकिस्तान के पेशावर के निकट उ० प्र०) से और शेष भारत से ब्राह्मी लिपि के अभिलेख मिले हैं।

**नोट:** *खरोष्ठी लिपि दायीं से बायीं ओर लिखी जाती थी।*

➤ अशोक के अभिलेखों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है— 1. शिलालेख, 2. स्तम्भलेख तथा 3. गुहालेख।

➤ अशोक के शिलालेख की खोज 1750 ई. में पाद्रेटी फैन्थेलर ने की थी। इनकी संख्या-14 है। अशोक के अभिलेख पढ़ने में सबसे पहली सफलता 1837 ई. में जेम्स प्रिंसेप को हुई।

➤ अशोक के स्तम्भ-लेखों की संख्या 7 है, जो केवल ब्राह्मी लिपि में लिखी गयी है। यह छह अलग-अलग स्थानों से प्राप्त हुआ है—

 1. **प्रयाग स्तम्भ-लेख :** यह पहले कौशाम्बी में स्थित था। इस स्तम्भ-लेख को अकबर ने इलाहाबाद के किले में स्थापित कराया।

 2. **दिल्ली-टोपरा :** यह स्तम्भ-लेख फिरोजशाह तुगलक के द्वारा टोपरा से दिल्ली लाया गया।

 3. **दिल्ली-मेरठ :** पहले मेरठ में स्थित यह स्तम्भ-लेख फिरोजशाह द्वारा दिल्ली लाया गया है।

 4. **रामपुरवा :** यह स्तम्भ-लेख चम्पारण (बिहार) में स्थापित है। इसकी खोज 1872 में कार्लायल ने की।

 5. **लौरिया अरराज :** चम्पारण (बिहार) में।

 6. **लौरिया नन्दनगढ़ :** चम्पारण (बिहार) में इस स्तम्भ पर मोर का चित्र बना है।

#### अर्थशास्त्र में वर्णित तीर्थ

| क्र. | तीर्थ | कार्य/पद |

| 1. | **मंत्री** | प्रधानमंत्री |

| 2. | **पुरोहित** | धर्म एवं दान-विभाग का प्रधान |

| 3. | **सेनापति** | सैन्य विभाग का प्रधान |

| 4. | **युवराज** | राजपुत्र |

| 5. | **दौवारिक** | राजकीय द्वार-रक्षक |

| 6. | **अन्तर्वेशिक** | अन्तःपुर का अध्यक्ष |

| 7. | **समाहर्त्ता** | आय का संग्रहकर्त्ता |

| 8. | **सन्निधाता** | राजकीय कोषाध्यक्ष |

| 9. | **प्रशास्ता** | कारागार का अध्यक्ष |

| 10. | **प्रदेष्ट्रि** | कमिश्नर |

| 11. | **पौरे** | नगर का कोतवाल |

| 12. | **व्यवहारिक** | प्रमुख न्यायाधीश |

| 13. | **नायक** | नगर-रक्षा का अध्यक्ष |

| 14. | **कर्मान्तिक** | उद्योगों एवं कारखानों का अध्यक्ष |

| 15. | **मंत्रिपरिषद् अध्यक्ष** | - |

| 16. | **दण्डपाल** | सेना का सामान एकत्र करनेवाला |

| 17. | **दुर्गपाल** | दुर्ग-रक्षक |

| 18. | **अंतपाल** | सीमावर्ती दुर्गों का रक्षक |

➤ कौशाम्बी अभिलेख को 'रानी का अभिलेख' कहा जाता है।

➤ अशोक का 7वाँ अभिलेख सबसे लम्बा है। अशोक का सबसे छोटा स्तम्भ-लेख रुम्मिनदेई है। इसी में लुम्बिनी में धम्म-यात्रा के दौरान अशोक द्वारा भू-राजस्व की दर घटाकर 1/8 भाग कर दिया और लुम्बिनी ग्राम का धार्मिक कर (बलि) माफ कर दिया।

**नोट:** *महास्थान (बांग्लादेश) से प्राप्त सोहगौरा का ताम्रपत्र अभिलेख में अकाल, सूखा जैसे दैवी प्रकोप के समय राज्य द्वारा राहत कार्य किए जाने का विवरण प्राप्त होता है।*

➤ प्रथम पृथक् शिलालेख में यह घोषणा है कि सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं।

➤ अशोक का शार-ए-कुना (कंधार) अभिलेख ग्रीक एवं आरमेइक भाषाओं में प्राप्त हुआ है।

➤ साम्राज्य में मुख्यमंत्री एवं पुरोहित की नियुक्ति के पूर्व इनके चरित्र को काफी जाँचा-परखा जाता था, जिसे उपधा परीक्षण कहा जाता था।

➤ सम्राट् की सहायता के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होती थी जिसमें सदस्यों की संख्या 12, 16 या 20 हुआ करती थी।

➤ अर्थशास्त्र में शीर्षस्थ अधिकारी के रूप में तीर्थ का उल्लेख मिलता है, जिसे महामात्र भी कहा जाता था। इसकी संख्या 18 थी। अर्थशास्त्र में चर, जासूस को कहा गया है।

➤ अशोक के समय मौर्य साम्राज्य में प्रांतों की संख्या 5 थी। प्रांतों को चक्र कहा जाता था। प्रांतों के प्रशासक कुमार या आर्यपुत्र या राष्ट्रिक कहलाते थे।

➤ प्रांतों का विभाजन विषय में किया गया था, जो विषयपति के अधीन होते थे।

➤ प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जिसका मुखिया ग्रामिक कहलाता था।

➤ प्रशासकों में सबसे छोटा गोप था, जो दस ग्रामों का शासन सँभालता था।

➤ मेगस्थनीज के अनुसार नगर का प्रशासन 30 सदस्यों का एक मंडल करता था जो 6 समितियों में विभाजित था। प्रत्येक समिति में 5 सदस्य होते थे।

➤ बिक्री-कर के रूप में मूल्य का 10वाँ भाग वसूला जाता था, इसे बचाने वालों को मृत्युदण्ड दिया जाता था।

➤ मेगस्थनीज के अनुसार एग्रोनोमाई मार्ग-निर्माण अधिकारी था।

➤ जस्टिन के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य की सेना में लगभग 50,000 अश्वारोही सैनिक, 9,000 हाथी व 8,000 रथ थे।

➤ जस्टिन नामक यूनानी लेखक के अनुसार, चन्द्रगुप्त ने अपनी 6 लाख की फ़ौज से सारे भारत को रौंद दिया। यह बात सही भी हो सकती है और नहीं भी, लेकिन यह सही है कि चन्द्रगुप्त ने पश्चिमोत्तर भारत को सेल्युकस की गुलामी से मुक्त किया। जस्टिन ने चन्द्रगुप्त की सेना को लुटेरों की सेना कहा है।

➤ युद्ध-क्षेत्र में सेना का नेतृत्व करनेवाला अधिकारी नायक कहलाता था।

➤ सैन्य विभाग का सबसे बड़ा अधिकारी सेनापति होता था। प्लिनी नामक यूनानी लेखक के अनुसार चन्द्रगुप्त की सेना में 6,00,000 पैदल सिपाही, 30,000 घुड़सवार और 9,000 हाथी थे।

#### प्रशासनिक समिति एवं उसके कार्य

| समिति | कार्य |

| **प्रथम** | उद्योग एवं शिल्प कार्य का निरीक्षण |

| **द्वितीय** | विदेशियों की देखरेख |

| **तृतीय** | जन्म-मरण का विवरण रखना |

| **चतुर्थ** | व्यापार एवं वाणिज्य की देखभाल |

| **पंचम** | निर्मित वस्तुओं के विक्रय का निरीक्षण |

| **षष्ठ** | बिक्री कर वसूल करना |

#### सैन्य समिति एवं उनके कार्य

| समिति | कार्य |

| **प्रथम** | जलसेना की व्यवस्था |

| **द्वितीय** | यातायात एवं रसद की व्यवस्था |

| **तृतीय** | पैदल सैनिकों की देख-रेख |

| **चतुर्थ** | अश्वा रोहियों की सेना की

 देख-रेख |

| **पंचम** | गजसेना की देख-रेख |

| **षष्ठ** | रथसेना की देख-रेख |


➤ मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य सेना का रख-रखाव 5 सदस्यीय, छह समितियाँ करती थीं।

➤ मौर्य प्रशासन में गुप्तचर विभाग महामात्य सर्प नामक अमात्य के अधीन था। अर्थशास्त्र में गुप्तचर को गूढ़ पुरुष कहा गया है तथा एक ही स्थान पर रहकर कार्य करनेवाले गुप्तचर को संस्था कहा जाता था। एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करके कार्य करनेवाले गुप्तचर को संचारा कहा जाता था।

➤ अशोक के समय जनपदीय न्यायालय के न्यायाधीश को राजुक कहा जाता था।

➤ सरकारी भूमि को सीता भूमि कहा जाता था। बिना वर्षा के अच्छी खेती होनेवाली भूमि को अदेवमातृक कहा जाता था।

➤ मौर्य काल में द्रोण अनाज के माप के लिए प्रयोग होता था।

➤ मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों में विभाजित किया है—1. दार्शनिक, 2. किसान, 3. अहीर, 4. कारीगर, 5. सैनिक, 6. निरीक्षक एवं 7. सभासद।

➤ स्वतंत्र वेश्यावृत्ति को अपनाने वाली महिला रूपाजीवा कहलाती थी।

➤ नंद वंश के विनाश करने में चन्द्रगुप्त मौर्य ने कश्मीर के राजा प्रवर्तक से सहायता प्राप्त की थी।

➤ मौर्य शासन 137 वर्षों तक रहा। भागवत पुराण के अनुसार मौर्य वंश में दस राजा हुए जबकि वायु पुराण के अनुसार नौ राजा हुए।

➤ मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ था। इसकी हत्या इसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने 185 ईसा पूर्व में कर दी और मगध पर शुंग वंश की नींव डाली।

**नोट:** *अशोकाराम बिहार पाटलिपुत्र में था।*

### 16. ब्राह्मण साम्राज्य

#### शुंग एवं कण्व राजवंश

➤ पुष्यमित्र शुंग, जिसने मगध पर शुंग वंश की नींव डाली, ब्राह्मण जाति का था। शुंग शासकों ने अपनी राजधानी विदिशा में स्थापित की।

➤ इण्डो-यूनानी शासक मिनांडर को पुष्यमित्र शुंग ने पराजित किया।

➤ पुष्यमित्र शुंग ने दो बार अश्वमेध यज्ञ किया। इनके लिए पतंजलि ने अश्वमेध यज्ञ कराए।

➤ भरहूत स्तूप का निर्माण पुष्यमित्र शुंग ने करवाया।

➤ शुंग वंश का अंतिम शासक देवभूति था। इसकी हत्या 73 ईसा पूर्व में वासुदेव ने कर दी और मगध की गद्दी पर कण्व वंश की स्थापना की।

➤ कण्व वंश का अंतिम राजा सुशर्मा हुआ।

#### सातवाहन राजवंश

➤ सिमुक ने 60 ईसा पूर्व में सुशर्मा की हत्या कर दी और सातवाहन वंश की स्थापना की। सातवाहन (आन्ध्र वंश) शासकों ने अपनी राजधानी प्रतिष्ठान (गोदावरी नदी के किनारे) में स्थापित की। *(प्रतिष्ठान महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में है।)*

➤ सातवाहन वंश के प्रमुख शासक थे सिमुक, शातकर्णी, गौतमीपुत्र शातकर्णी, वासिष्ठीपुत्र, पुलुमावी तथा यज्ञश्री शातकर्णी।

➤ शातकर्णी ने दो अश्वमेध तथा एक राजसूय यज्ञ किया।

➤ सातवाहन शासकों के समय के प्रसिद्ध साहित्यकार हाल एवं गुणाढ्य थे। हाल ने (गाथासप्तशती) तथा गुणाढ्य ने बृहत्कथा नामक पुस्तकों की रचना की।

➤ सातवाहन ने चाँदी, ताँबे, सीसा (सर्वाधिक), पोटीन और काँसे की मुद्राओं का प्रचलन किया। सातवाहन अपना सिक्का ढालने में जिस सीसे का इस्तेमाल करते थे, उसे रोम से मँगाया जाता था।

➤ ब्राह्मणों को भूमि-अनुदान देने की प्रथा का आरंभ सातवाहन शासकों ने ही सर्वप्रथम किया। भूमिदान का सर्वप्राचीन पुरालेखीय प्रमाण शताब्दी ई. पू. के सातवाहनों के नानाघाट अभिलेख में मिलता है, जिसमें अश्वमेध यज्ञ में एक गाँव देने का उल्लेख है।

➤ सातवाहनों की राजकीय भाषा प्राकृत एवं लिपि ब्राह्मी थी।

➤ सातवाहनों में हमें मातृसत्तात्मक ढाँचे का आभास मिलता है। उनके राजाओं के नाम उनकी माताओं के नाम पर रखने की प्रथा थी, जैसे-गौतमीपुत्र, वासिष्ठीपुत्र आदि। लेकिन सातवाहन राजवंश पितृसत्तात्मक था, क्योंकि राजसिंहासन का उत्तराधिकारी पुत्र ही होता था।

➤ सातवाहन शासकों ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन का काम गॉल्मिक को सौंपा। गॉल्मिक एक सैनिक टुकड़ी का प्रधान होता था जिसमें नौ रथ, नौ हाथी, पच्चीस घोड़े और पैंतालीस पैदल सैनिक होते थे।

➤ सातवाहनों की महत्वपूर्ण स्थापत्य कृतियाँ हैं—कार्ले का चैत्य, अजंता एवं एलोरा की गुफाओं का निर्माण एवं अमरावती कला का विकास। शातकर्णी एवं अन्य सभी सातवाहन शासक दक्षिणापथ के स्वामी कहे जाते थे।

➤ आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्थित धरणीकोट नामक स्थान सातवाहन युग में धान्यकटक नाम से विख्यात था। यह अमरावती के निकट था। यह कुछ काल तक सातवाहनों की राजधानी रहा। इस नगर की प्रसिद्धि का कारण इसका महत्वपूर्ण व्यापारिक मंडी होना था। यह सातवाहन साम्राज्य के पूर्वी भाग की सबसे बड़ी मंडी थी। यहाँ से उत्तर तथा दक्षिण को अनेक व्यापारिक मार्ग गुजरते थे। महासंघिकों के अधीन यह एक प्रमुख बौद्ध केन्द्र के रूप में समृद्ध हुआ क्योंकि वहाँ के समृद्ध व्यापारियों ने स्तूपों एवं अन्य बौद्ध स्मारकों का निर्माण करवाया।

**नोट:** *सातवाहन राज्य ने उत्तर और द. भारत के बीच सेतु का काम किया।*

#### चेदि राजवंश (कलिंग)

➤ अशोक की मृत्यु के उपरांत संभवतः प्रथम शताब्दी ई.पू. में कलिंग में चेदि राजवंश का उदय हुआ। इसकी जानकारी हमें हाथी गुम्फा अभिलेख (भुवनेश्वर, उड़ीसा) से मिलती है। खारवेल इस वंश का एक प्रतापी राजा था।

➤ खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था और उसने जैन मुनियों के लिए उदयगिरि की पहाड़ी में गुफा का निर्माण करवाया था।


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